<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952</id><updated>2012-01-21T02:40:16.407-08:00</updated><category term='गाधीयन सत्याग्रह ब्रिगेड'/><category term='भोजपुरिया लोग'/><category term='राज ठाकरे'/><category term='हिंद स्वराज'/><category term='गुमराह'/><category term='राजनीति'/><category term='श्रंद्धांजलि'/><category term='भोजपुरिया मशाल'/><category term='जय भोजपुरिया'/><category term='गांधी'/><category term='अंजोरिया'/><category term='भोजपुरिया मशाल 4'/><category term='बुद्धिजीवी'/><category term='इंटरनेट'/><category term='छठ'/><category term='गोविंद मूनिस'/><category term='नीलाम'/><category term='समाजवादी पार्टी'/><category term='नदिया के पार'/><category term='शब्द'/><category term='ज्ञानी'/><category term='मुलायम सिंह यादव'/><category term='राहुल गांधी का जन्म दिन'/><category term='मुंबई'/><category term='दोस्ती'/><category term='भोजपुरिया मशाल-2'/><category term='भोजपुरिया मशाल 3'/><category term='समलैंगिकता'/><category term='महात्मा गांधी'/><category term='राहुल गांधी'/><category term='अमर सिंह'/><title type='text'>आपन देश</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://aapandesh.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1692358131297480952/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aapandesh.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>69</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-1149480179361214223</id><published>2012-01-21T02:33:00.000-08:00</published><updated>2012-01-21T02:40:16.426-08:00</updated><title type='text'>बस जीने दो यारों...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-go_r-WXGaSQ/TxqVSpW51eI/AAAAAAAAAL4/RM8Ze1q3cQ4/s1600/jine%2Bdo%2Byaro.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-go_r-WXGaSQ/TxqVSpW51eI/AAAAAAAAAL4/RM8Ze1q3cQ4/s320/jine%2Bdo%2Byaro.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5700032425962886626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो ताँडव हमारा पुराना शौक है। पर इसे करने से हम डरते थे, सहमते थे, लजाते थे, संकुचाते थे। अब कैसा डर, किसका डर, क्यों डरे हम...कोई है... जो रोके हमें, टोके हमें...जो थे, या हो सकते थे उनको तो हमने कब का टपका दिया है।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सम्बन्ध।&lt;/strong&gt; इस बन्धन से आज दुनिया मुक्त होना चाहती है। मुक्ति की कामना रखने वाले इससे अकुता गए हैं। फिजूल का झंझट भला क्यों मोले बिंदासपन में जीने वाले ये लोग। देश आजाद है, हम भी आजाद हैं। आजादी हैं सम्बन्धविहिन समझौतावादी समाज में जीने का। जहाँ पर आप और हम वस्तु की तरह खरीदे-बेचे जाते हैं। तौले जाते हैं। मापे जाते हैं। रौंदे जाते हैं। पटके जाते हैं। मन भर गया तो उठा कर फेंक दिए जाते हैं। समझौता रद्द कर दी जाती है। कोई बोलने वाला नहीं। टोकने वाला नहीं। मनाने वाला नहीं। हम आजाद देश के आजाद लोग जो ठहरे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम चाहते हैं-सम्बन्ध हो बन्धन न हो। बन्धन हमारी समझौतावादी समाज को पनपने देने में सबसे बड़ी रोड़ा जो है। रास्ता सुगम बनाना है तो रोड़ों को तो हटाना ही पड़ता है। हम भी लगे हैं, इन रोड़ों को हटाने में...हो सके तो मिटाने में। न बाँस रहेगा न बाँसुरी बजेगी। और हम मस्त होकर ताँडव करते रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो ताँडव हमारा पुराना शौक है। पर इसे करने से हम डरते थे, सहमते थे, लजाते थे, संकुचाते थे। अब कैसा डर, किसका डर, क्यों डरे हम...कोई है... जो रोके हमें, टोके हमें...जो थे, या हो सकते थे उनको तो हमने कब का टपका दिया है। अब तो उनके लोर (आँसू) भी उनका साथ नहीं देते...वे चाहते हैं अपने लोर से समुद्र में हिलोर लाना। अफसोस!  समुद्र की गहराई ने पहले ही उनकी लोर को इतना सोंख लिया है कि आँखों की नमी सूर्ख हो गयी हैं। अब तो बंद होने को आई पुतलियाँ तमाशबिन बन कर रह गई हैं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सम्बन्धविहिन समाज के निर्माण का वायरस धीरे-धीरे मानवीय धरा को अपने जद में लेने में सफल हो रहा है। और हम उसकी सफलता पर ताली बजा रहे हैं। जश्न मना रहे हैं। आजादी के गीत गा रहे हैं।&lt;br /&gt;दुनिया में कुछ दूसरे लोग भी हैं। जिन्हें इनकी आजादी पसन्द नहीं है। वे इनसे जलते हैं, खुद को जलाते हैं और इसी में भस्म हो जाते हैं। इनको वे वायरस कहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उन्हें यह अनुभव हो गया है कि उन्हें जरूरत है मजबूत एंटीवारयस की। जिसमें सम्बन्धों को जीने की ललक हो। सम्बन्धों की समझ हो। एक-दूसरे से बंधे रहने की चाहत हो। बंधन का अनुशासन हो। उनके लिए सम्बन्धों की परिभाषा ही दूसरी है। वे सम्बन्धों से मुक्त नहीं बल्कि सम्बन्धों से युक्त रहना चाहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच में एक-दूसरे से समान रूप से बंधने को ही तो सम्बन्ध कहते हैं। बंधन में असमानता ही सम्बन्धों को असहज बनाती है। असुरक्षित करती है और सम्बन्धविहिन वायरस को फैलने का प्लैटफॉर्म देती है। सम्बन्ध कभी भी विषम नहीं होता। वह सम् ही होता है। सम् का मतलब समानता से भी है और समर्पण से भी। दोनों के बीच संबन्धों का तापमान जबतक बराबर रहता है, समर्पण के भाव में गहराई रहती है...सम्बन्ध बने रहते हैं। जब तापमान में उतार-चढ़ाव आता है और कुछ ज्यादा ही आ जाता है, तब सम्बन्ध समान नहीं रह जाते। सम्बन्ध में से सम् अर्थात् समानता और समर्पण गायब हो जाते हैं। इस सम् के बिना सम्बन्ध की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? इसके बिना सम्बन्ध तो ‘बन्ध’ बनकर ही रह जाता है। और इसी ‘बन्ध’ में केमिकल लोचा होकर संबन्धविहिन समाज का वायरस तैयार होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हम तो दर्शी हैं। वायरस को फैलते भी देखते हैं और एंटीवायरस को इससे जुझते भी। जीत किसकी होगी यह तो कोई दूरदर्शी ही बतायेगा। मैं तो बस सम्बन्धों को जीने में विश्वास करता हूँ, जीता भी हूँ और अपने वायरसों एवं एंटीवारसों से यही चाहता हूँ-बस जीने दो यारों...&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपर्क-91-8108110151&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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शुरू में जन की ओर से की गई यह गलती धीरे-धीरे इतनी विकराल हो गई कि ये कलपुर्जे बिना ‘कुछ’ लिए काम करना ही बंद कर दिए। &lt;br /&gt;ऐसे में जन में ‘तंत्र’ के इन ‘कलपुर्जों’ के प्रति दुराव की भावना का पनपना स्वाभाविक ही (था) है। पहले तो जन को लगा कि कोई बात नहीं धीरे-धीरे सबकुछ ठीक हो जायेगा। लेकिन जब सबकुछ में कुछ भी ठीक होने की कोई संभावना नहीं दिखी तो 21 वीं सदी के गांधी का जन्म हुआ। जिसको लोग 21 वीं सदी के दूसरे दशक में अन्ना हजारे के नाम से जान-पहचान रहे हैं। वैसे तो इस नाम से देश-दुनिया के लोग परिचित थे लेकिन जब इस नाम ने गांधी का रूप धारण किया तो सारी दुनिया देखती रह गई। गुलाम भारतीयों को लगा कि अब उनको भी आजादी मिलने वाली है। पूरे देश में अन्ना रूपी गांधी की आंधी उसी तरह बहने लगी जैसे 20 वीं सदी के दूसरे, तीसरे और चौथे दशक में महात्मा रूपी गांधी की बही थी। जिन्होंने फिरंगियों को सात-समंदर पार जा ढ़केला।&lt;br /&gt;इसी तरह की आंधी की बयार दिल्ली के जंतर-मंतर के प्रांगण से बही और देखते ही देखते पूरा हिंदुस्तान इसके आगोश में आ गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ चली इस बयार ने ‘तंत्र’ को यह बता दिया कि तुम ‘जन’ के सेवक हो, जन के मालिक नहीं। 21वीं सदी का चालाक हो चुके ‘तंत्र’ ने भी चालाकी से इस बयार को तुरंत शांत करने के लिए, अन्ना की शर्तों को मान लिया। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भ्रष्टाचार के खिलाफ बही इस आंधी में जनतंत्र को मजबूत करने वाला चौथा स्तंभ अर्थात् मीडिया ने सराहनीय कार्य किया। लेकिन यह एक अहम सवाल है कि मीडिया ने क्या सचमुच प्रशंसनीय कार्य किया अथवा उससे हो गया!&lt;br /&gt;यह जगजाहिर है कि पिछले दो दशकों में मीडिया ने अपना एक अलग तंत्र विकसित किया है, जो जनतंत्र के ‘तंत्र’ के साथ सांठ-गांठ कर के जन में भ्रम पैदा करने का काम करता रहा है। खैर जाने-अंजाने में ही सही, मीडिया ने गांधी को उभारने का काम तो किया ही। इसके लिए उसकी सराहना तो की ही जानी चाहिए।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दो सालों से महात्मा गांधी द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ के सौ साल पूरे होने के परिप्रेक्ष्य मंर पूरे हिंदुस्तान में कई जगहों पर गांधी की प्रासंगिकता पर नए सिरे से बहस चलती रही है। इन्हीं बहसों के परिणाम के रूप में 21 वीं सदी के गांधी के जन्म को भी लिया जाना चाहिए। जिसने गांधी की प्रासंगिकता को नए सिरे से परिभाषित करने का काम किया है और ‘तंत्र’ के ‘कलपुर्जों’ को यह बताने में सफल रहा है कि सुधर जाओ नहीं तो ‘ईंधन’ बंद कर देंगे। &lt;br /&gt;बचपन से स्व. पं. श्री राम आचार्य की यह उक्ति सुनता रहा हूं-21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य। तो क्या सचमुच इस सदी में हम 20 वीं सदी के स्याह पक्षों को उज्ज्वल कर पाएंगे! अगर यह संभव हो गया तो शायद जगदगुरु भारत को एक बार फिर से सोने की चिड़िया कहलाने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।&lt;br /&gt;लेखक संस्कार पत्रिका में सीनियर कॉपी एडिटर हैं&lt;br /&gt;संपर्क &lt;br /&gt;zashusingh@gmail.com  &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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15 साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक, सब के सब मौत को अपना यार बना रहे हैं। लखनऊ वालों का यह याराना आने वाले समय में सूबे की सरकार को जनता की अदालत में बेनकाब कर सकता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तरप्रदेश की राजनीतिक  राजधानी होने के नाते राजनीतिक कारणों से से लखनऊ चर्चा में बना ही रहता है। पिछले एक  महीने से सूबे में बढ़ते अपराध ने राजकीय और राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपने तरफ खींचा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से, मुस्कुराने वाला लखनऊ टेंशन में जी रहा है। इसकी तरफ शायद ही किसी राजकीय अथवा राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान गया है। इसकी एक  बानगी पिछले शनिवार (9, जुलाई,2011) को देखने को मिली जब बीए प्रथम वर्ष का छात्र अनुभव गुप्ता ने शहर के रतन स्कावयर बिल्डिंग से छलांग लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अपने जीवन को यमराज को सौंपने के पूर्व उसने ग्यारह पन्ने का सुसाइड नोट लिखा। अपने मौत के नाम इतना लंबा खत,  अनुभव गुप्ता की जिंदगी का अनुभव कितना बुरा रहा होगा इसको बयां करने के लिये पर्याप्त है। &lt;br /&gt;लखनऊ वाले अवसाद में जी रहे हैं, यह बात कहने की हिमाकत मैं इसीलिए कर पा रहा हूं क्योंकि इस बावत मैंने प्रयोग के तौर पर एक छोटा सा रिसर्च किया है। जिसमें मैंने पिछले महीने की 15 तारीख से लेकर 30 तारीख तक के दैनिक अखबारों में से किसी भी पांच दिन का अखबार निकाल कर उसमें छपे आत्महत्याओं से जुड़ी खबरों का अध्ययन किया इस अधययन में चौकाने वाले परिणाम सामने आए। इन पांच दिनों के अखबार में केवल लखनऊ शहर से 13 आत्महत्याओं की खबर प्रकाशित की गई थी। जिसमें तीन आत्महत्याएं पत्नी के मायके जाने के कारण, एक पति से विवाद के कारण,  दो पत्नी से विवाद के कारण, एक दहेज प्रताड़ना के कारण और ६ अज्ञात कारणों से की गई थी।&lt;br /&gt;15 जून को चार लोगों की आत्महत्या की खबर प्रकाशित हुई। फतेहगंज मंडी का रहने वाला 50 वर्षीय मुन्ना लाल वाल्मिकी ने पत्नी के मायके चले जाने के कारण मौत को गले लगा लिया। ठीक  इसी तरह 22 साल का यहियागंज निवासी शैलेंद्र कुमार ने भी पत्नी अंजली के मायके चले जाने के कारण यमराज को न्योता दे दिया। अभी इनकी शादी के महज सात महीने ही गुजरे थे। इसी दिन मड़ियाव सरैया टोला निवासी 45 वर्षीय रवींद्र चौहान जो कि राज मिस्त्री था, ने भी खुदकुशी कर खुद को खुद से मुक्त कर लिया। इसी तरह दहेज प्रताड़ना से परेशान होकर शादी के तीन महीने में ही रजनी (22) ने अपनी देहलीला समाप्त कर लिया। 19 जून को शहर से खुदकुशी का एक मामला प्रकाशित हुआ। मड़ियाव के आईईसी कैंपस में रहने वाले राजीव कुमार का पुत्र पुरवा वर्मा जो कि अभी महज 15 साल का था और नवीं कक्षा में पढ़ता था, ने आत्महत्या कर लिया। 20 जून को नवीपना गांव के रहने वाले ननकू लाल का पुत्र नीरज(25) ने पत्नी से विवाद के कारण आत्महत्या कर ली तो दूसरी तरफ राजाजीपुरम सेक्टर-12 निवासी गजराज (32) जो कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था, अपने जीवन का कंपटीशन पास नहीं कर सका। 21 जून को बंथरा नारायणपुर की ललिता अपने पति नीरज के मारपीट से तंग आकर खुद को यमराज के हवाले कर दिया। इसी दिन अलीगंज के मूक व बधिर संकूल परिसर में 50 साल का एक गार्ड शिवपाल ने मौत को गले लगा लिया।&lt;br /&gt;29 जून को चार खुदकुशी के मामले प्रकाशित हुए। कृष्णानगर निवासी कैलाश, बिजली विभाग से रिटायर हो चुके 70 वर्षीय नरेंद्र प्रसाद, मोहन लाल कि नातिन विशेष गुप्ता (18) और गोमती नगर विवेक खंड निवासी संतोष कुमार (35) ने भी मौत से दोस्ती करने में ही अपनी भलाई समझी।&lt;br /&gt;ऊपर जितनी घटनाओं का मैंने जिक्र किया यह तो महज बानगी मात्र है। वास्तविक स्थिति तो और भयावह होगी।&lt;br /&gt;ऊपर की तस्वीर देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस कदर लखनऊ अवसाद के गिरफ्त में आता जा रहा है। किस कदर मौत से दोस्ती गांठ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जिस तरह से आदमी का अपने जीवन के संघर्षों से मोह भंग हो रहा है, वह सामाजिक परिवेश में हो रहे नकारात्मक  बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। धैर्य कमजोर हुआ है। साहस गूम होता जा रहा है। प्यार, स्वार्थ होता जा रहा है। वैसे भी यह सर्वविदित है कि जहां स्वार्थ परम हो जाता है वहां पर रिश्तों की कोई अहमियत नहीं रह जाती। कल तक  संयुक्त परिवार के टूटने पर हम मातम मना रहे थे और आज एकल परिवार भी टूटने लगे हैं। क्यों ? इस क्यों के जवाब में बदलते सामाजिक परिवेश की कहानी छुपी हुई है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दूसरों को मुस्कुराने की नसीहत देने वाला लखनऊ आज अवसाद में है। इस अवसाद को देखने समझने वाला कोई नहीं है। पूरे धरती को अपने माथे पर उठाने वाले शेषनाग के अवतार लक्ष्मण की इस नगरी में उनके नागरिक अपना बोझ नहीं उठा पा रहे है! 15 साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक, सब के सब मौत को अपना यार बना रहे हैं। लखनऊ वालों का यह याराना आने वाले समय में सूबे की सरकार को जनता की अदालत में बेनकाब कर दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;em&gt;सूबे की कलयुगी सरकार को चाहिए कि वह लक्ष्मण नगरी में ऐसी रेखा खींचे जिससे खुदकुशी करने वालों की आत्मा को हरने के लिए यमराज का प्रवेश न हो सके। अगर इसी तरह यमराज को असमय लखनऊ वालों का प्राण हरने का मौका मिलता रहा तो, इन अतृप्त आत्माओं की काली छाया से सूबे की ‘मायावी नगरी’ को कौन बचा सकता है!&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट&lt;br /&gt;यह लेख जून 2011 में लिखा गया था&lt;br /&gt;लेखक संस्कार पत्रिका से जुड़े हुए हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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लखनऊ'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-6355681798315021078</id><published>2010-11-12T04:10:00.000-08:00</published><updated>2010-11-12T04:12:58.923-08:00</updated><title type='text'>भोजपुरी सिनेमा पर अब तक का सबसे बड़ा जन सर्वेक्षण</title><content type='html'>द संडे इंडियन और आईसीएमआर ने कराया सर्वेक्षण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजपुरी सिनेमा 50 सालों का सफर पूरा कर चुका है. इस लंबी पारी में अब तक लगभग 475 फिल्में प्रदर्शित हो चुकी हैं. बदलते वक्त के साथ-साथ भोजपुरी फिल्मों का मिजाज भी लगातार बदल रहा है. यह बदलाव कितना सकारात्मक है और कितना नकारात्मक और इसमें अपने-अपने क्षेत्र में किन लोगों ने सबसे श्रेष्ठ काम किया है. यह जानने के लिए द संडे इंडियन और इंडियन कॉउसिल ऑफ मार्केट रिसर्च (आईसीएमआर) ने राष्ट्रीय स्तर पर 3000 लोगों की राय जानने की कोशिश की. यह सर्वेक्षण मार्च 2009  से मार्च 2010  के बीच प्रदर्शित भोजपुरी फिल्मों के आधार पर किया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुख्य बातें एक नजर में... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम लोगों की राय में दिनेश लाल यादव सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, समीक्षकों की नजर में रवि किशन न.1 की पदवी पर हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर बात की जाए अभिनेत्रियों कि तो पाखी हेगड़े ने रानी चटर्जी को 1.25 प्रतिशत की बढ़त के साथ दूसरे पायदान पर पिछे छोड़ दिया, पाखी को 43.75 फीसदी तो रानी को 42.5 प्रतिशत लोगों ने पसंद किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनोज तिवारी समीक्षकों की नजर में दूसरे पायदान पर तो आम लोगों ने उन्हें अपने दिल में चौथा स्थान दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समीक्षकों ने रिंकू घोष को सफलता के पायदान पर सबसे आगे रखा तो पाखी को सबसे नीचले पायदान पर, इस दौड़ में जहां रानी चटर्जी को तीसरा स्थान मिला तो वहीं मोनालिसा को दूसरा स्थान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम लोगों की नजर में हॉट मोनालिसा हुई कोल्ड, पहुंची चौथे स्थान पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम लोगों ने गायक से अभिनेता बने पवन सिंह को सर आंखों पर बैठाया तो समीक्षकों ने पवन सिंह चौथे पायदान पर रखा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गायकी में उदित नारायण और कल्पना न.1 पर पहुंचे&lt;br /&gt;तो इंदू सोनाली और पवन सिंह ने दूसरे स्थान पर अपना नाम दर्ज करवाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवोदित अभिनेता और अभिनेत्री की श्रेणी में प्रवेश लाल यादव और सुभी शर्मा न.1 चुने गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइटम गर्ल संभावना का जादू एक बार फिर चला आम लोगों ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ का ताज पहनाया तो सीमा सिंह को दूसरे व कविता सिंह को तीसरा स्थान दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशन के क्षेत्र में असलम शेख को लोगों ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का दर्जा दिया तो दूसरी ओर समीक्षकों ने राजकुमार आर पांडेय को बेहतर निर्देशक बताया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संगीत निर्देशन में लोगों ने धनंजय मिश्रा को सिरमौर बताया&lt;br /&gt;तो दूसरी ओर समीक्षकों ने मधुकर आनंद को न.1 का हकदार बताया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विनय बिहारी बने न. वन गीतकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संतोष मिश्रा पटकथा लेखन की श्रेणी में, कुणाल सिंह चरित्र अभिनेता की श्रेणी में, कानू मुखर्जी सर्वश्रेष्ठ नृत्य निर्देशक की श्रेणी में, अवधेश मिश्रा सर्वेश्रेष्ठ खलनायक और कला निर्देशन के क्षेत्र में अंजनी तिवारी, एक्शन डायरेक्टर की श्रेणी में शकील ने अपना ना दर्ज करवाया तो मनोज टाइगर सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार के रूप में पहले पायदन पर ऊभर कर आए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्च 2009 -10  की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की बात की जाए तो भूमिपुत्र, दीवाना, तोहार नइखे कवनो जोड़ तू बेजोड़ बाड़ू हो, उमरिया कइलीं तोहरे नाम और परिवार अव्वल रही वहीं दूसरी ओर निरहुआ के प्रेम के रोग भइल, हो गइनी दीवाना तोहरे प्यार में, रंगबाज दरोग, कानून हमरा मुट्ठी में जैसी फिल्मों ने भी खूब चर्चा बटोरी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;48 फीसदी लोगों ने यह माना कि भोजपुरी फिल्में अश्लीलता के मामले में हिंदी फिल्मों से कम अश्लील है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;45 फीसदी लोग भोजपुरी सिनेमा के लोकप्रियता की मुख्य वजह गीत-संगीत को मानते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजपुरी फिल्मों में भोजपुरिया संस्कृति की झलक अब नहीं मिल रही है, ऐसा मानना है 48 फीसदी लोगों का, जबकि28 फीसदी लोग यह मानते हैं कि जितनी होनी चाहिए उससे थोड़ा ही कम है.  43 फीसदी लोग यह भी मानते हैं कि दूसरी क्षेत्रीय फिल्मों के मुकाबले भोजपुरी फिल्में बेहतर नहीं हैं,  जबकि 42 फीसदी लोग इसे बेहतर मानते है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी जानकारी के लिए द संडे इंडियन भोजपुरी का फिल्म स्पेशल अंक और साथ ही हिंदी अंक जरूर पढ़ें.&lt;br /&gt;लॉग ऑन करें&lt;br /&gt;www.thesundayindian.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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बड़ा जन सर्वेक्षण'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-4307066843476939546</id><published>2010-11-12T00:47:00.000-08:00</published><updated>2010-11-12T00:56:34.233-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छठ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राज ठाकरे'/><title type='text'>छठ: आस्था पर राजनीति</title><content type='html'>बिहार के सबसे बड़े सांस्कृतिक पर्व छठ का विस्तार बहुत तेजी से सभी नगरो-महानगरों में हो रहा है. मुंबई, दिल्ली और कोलकाता के साथ-साथ छठ मनाने वालों की अच्छी-खासी तादाद दक्षिण के राज्यों में भी देखने को मिल रही है. इतना ही नहीं पूर्वोत्तर के राज्य भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के बड़े शहरों में जैसे-जैसे छठ मनाने वालों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस संख्या पर राजनीति करने वालों की संख्या में भी इजाफा होता जा रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; राम नरेश मिश्रा का परिवार दिल्ली के जैतपुर गांव में पिछले 20 सालों से रहता आ रहा है. उनका कहना है कि वे लोग जब यहां आए तब छठ करने वालों की संख्या बहुत कम थी. लेकिन अब छठ व्रतियों की संख्या हजारों में हो गई है. बदरपुर के ही रहने वाले डॉ. रजा हैदर का कहना है कि छठ का प्रभाव देखना हो तो आप यहां के दीवारों पर छठ की शुभकामनाओं से अटे पड़े पोस्टरों पर गौर फरमाइए. दिल्ली की सभी पार्टियों के स्थानीय नेता अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़े-बड़े होर्डिंग्स और बैनरों पर शुभकामना संदेश देने में जुट गए हैं. शायद यही कारण है कि आली गांव में बैनर बनाने का काम करने वाले असलम खां को इन दिनों बैनर पर शुभकामना संदेश लिखने से फुर्सत नहीं है. असलम खां का कहना है कि, अक्टूबर-नवंबर महीने में उनकी कमाई कई गुना बढ़ जाती है क्योंकि इन महीनों में दशहरा, दीपावली और छठ का पर्व मनाया जाता है और छोटे-बड़े सभी नेता इन मौकों पर अपने क्षेत्रवासियों को बधाई देने से चूकना नहीं चाहते. &lt;br /&gt;इन शुभकामना संदेशों के निहितार्थ को समझाते हुए पुरबिया नेता प्रभुनाथ सिंह ने बताया कि शहरों में जैसे-जैसे पूर्वांचल के लोगों कि संख्या बढ़ रही है और वोट प्रतिशत बढ रहा है, वैसे-वैसे नेताओं का नजरिया भी बदला है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर दिल्ली के राजनीतिक भूगोल की बात की जाए तो दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में से पूर्वांचली मतदाता चार सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं. कांग्रेस ने पहले छठ पर छुट्टी घोषित कर व भोजपुरी-मैथिली-अकादमी की स्थापना कर और अब महाबल मिश्र को लोकसभा में भेजकर पूर्वांचलवासियों को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश की है. चुनाव आते ही राजनीतिक दल दिल्ली में रहने वाले पूर्वांचल यानी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को लुभाने में लग जाते हैं. पिछले कुछ सालों में जिस तरह से दिल्ली की तस्वीर बदली है, उसमें पूर्वांचल के लोग वोट बैंक के रूप में एक मजबूत ताकत बन कर उभरे हैं. &lt;br /&gt;दिल्ली में मतदाताओं की संख्या करीब1.10 करोड़ है. इसमें से करीब 35 लाख मतदाता पूर्वाचल के हैं. विशाल वोट बैंक की वजह से ही पूर्वांचली दिल्ली की राजनीतिक तस्वीर बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं. वैसे तो पूर्वांचली लोगों की उपस्थिति दिल्ली के कोने-कोने में है, लेकिन  सात में से चार लोकसभा और दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा सीटों पर वे निर्णायक भूमिका में होते हैं. दिल्ली की पूर्वी उत्तर पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में पूर्वांचली मतदाताओं की संख्या 20 से 25 फीसदी के करीब है. जबकि बाकी तीनों सीटों पर पूर्वांचली मतदाताओं की तादाद करीब 10 फीसदी है. &lt;br /&gt;पूर्वांचल के लोगों कि बढ़ती ताकत का ही नतीजा है कि पुरबियों के सांस्कृतिक पर्व छठ में शरीक होने के लिए नेताओं की होड़ लगी रहती है. पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सीएम इन वेटिंग विजय कुमार मल्होत्रा ने पूर्वांचलियों को रिझाने के लिए सूर्य को अर्घ्य दिया था. दूसरी ओर दिल्ली की मुख्यमंत्री और अपने को पूर्वांचल की बेटी कहने वाली शीला दीक्षित छठ घाटों का निरीक्षण करती नजर आ जाती हैं. पूर्वांचली मतदाताओं को लुभाने की इसी कवायद का नतीजा है कि बिहार जागरण मंच की ओर से पूर्वी दिल्ली में यमुना के तट पर पल्टन पुल भैरो मार्ग पर कराए जाने वाले छठ पूजा के आयोजन में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, एके वालिया, मदन लाल खुराना, महाबल मिश्रा, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता-अभिनेता पहुंचते रहे हैं. बिहार जागरण मंच के अध्यक्ष दिनेश प्रताप सिंह भी इस बात से इंकार नहीं कर रहे हैं कि छठ के माध्यम से राजनीतिक लाभ उठाने का भरसक प्रयास होता रहा है. &lt;br /&gt;इस बार छठ पूजा के दौरान भाजपा दिल्ली में रहने वाले पूर्वांचली लोगों को खुश करने के लिए एक नई कोशिश करने वाली है. दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में बने छठ पूजा के घाटों पर भाजपा के कार्यकर्ता अपना बैनर लिए लोगों की मदद करते और चाय पिलाते नजर आयेंगे. प्रदेश अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता की अध्यक्षता में हुई एक मीटिंग में दिल्ली प्रदेश भाजपा ने यह तय किया है कि इस बार पार्टी सभी छठ घाटों पर अपने बैनर तले छठ व्रतियों की सुविधा के लिए टेंट और कैंप लगायेगी. इस बाबत दिल्ली प्रदेश भाजपा के सचिव कुलजीत सिंह चहल ने बताया कि भाजपा इस बार छठ व्रतियों को किसी तरह की असुविधा न हो इसका पूरा-पूरा ख्याल रखेगी. उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस की सरकार पुरबियों को फुसलाने के लिए घोषणाएं तो कर देती है लेकिन उन घोषणाओं पर अमल नहीं किया जाता. न तो छठ घाटों की सफाई का ख्याल रखा जाता है और ना ही छठ पूजा करने के लिए नदी-तालाब में साफ पानी की कोई व्यवस्था की जाती है.&lt;br /&gt;पिछले 50 सालों से दिल्ली में रह रहे और दिल्ली में छठ के क्रमवार विकास को देखने वाले भोजपुरी समाज के अध्यक्ष अजीत दुबे ने अपनी यादों को ताजा करते हुए कहते हैं, “1956 में मेरा परिवार सरोजनी नगर में रहता था. उस समय मेरे घर की औरतें घर की छत पर खड़े होकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया करती थीं. 60-70 के दशक में मुहल्ले में एक गढ्ढा खोदकर और उसमें पानी भर कर छठ पूजा होने लगी. 70-80 के दशक में मेरा परिवार पालम के क्षेत्र में आ गया. वहां डाबरी मंदिर के पास एक तालाब के किनारे छठ किया जाने लगा. देखते-देखते हजारों की संख्या में महिलाएं छठ व्रत करने लगी हैं.'' &lt;br /&gt;पुरबियों की तादाद दिल्ली में लगातार बढ़ी है और उसके साथ राजनीतिक भागीदारी में भी इजाफा हुआ है. यही कारण है कि दिल्ली के सभी दल इस वोट बैंक को अपने लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं. लेकिन राजनीतिक दल इस बात को स्वीकारने में हिचकते हैं. दिल्ली में कांग्रेस का पुरबिया चेहरा समझे जाने वाले शिवराम पांडेय को छठ के नाम पर कोई राजनीति की बात नागवार गुजरती है. उनका कहना है कि छठ पूर्वांचल के लोगों का एक सांस्कृतिक पर्व है और इसमें सभी लोग भाग लेते हैं. उन्हीं के सुर में सुर मिलाते हुए और छठ के नाम पर किसी तरह की राजनीति से इनकार करते हुए दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष जय प्रकाश अग्रवाल ने टीएसआई को बताया कि हमारे क्षेत्र में छठ मनाने वाले लोगों की भारी तादाद है. जिस तरह से मैं रामलीला में भाग लेने जाता हूं उसी तरह छठ में भी भाग लेता हूं. इसमें राजनीति की कहां बात है. एक सामाजिक आदमी होने के नाते छठ जैसे बड़े आयोजन में भाग लेने को राजनीतिक फायदे-नुकसान की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि छठ पर राजनीति केवल दिल्ली में ही देखने को मिलती है. छठ पर सबसे ज्यादा कहीं राजनीति होती है तो वह है देश की आर्थिक नगरी मुंबई. दिल्ली की ही तरह मुबंई में भी छठ को लेकर बहुत जोर-शोर से तैयारी होती है. संजय निरूपम जब शिवसेना में हुआ करते थे, तब से ही वे वहां पर बिहार के लोगों को एक सूत्र में बांधने का काम करते रहे हैं. जुहू घाट पर छठ पूजा को भव्यता प्रदान करने में भी संजय निरूपम का अहम योगदान रहा है. संजय निरूपम अगर आज लोकसभा पहुंचे हैं तो उसके पीछे वहां रह रहे पुरबिया लोगों की ताकत का बड़ा योगदान है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबई में पुरबियों की बढ़ती ताकत का अंदाजा उससे भी हुआ जब पुरबिया लोगों को मुंबई से भगाने की मुहिम चला रहे राज ठाकरे यह कहना पड़ा कि वह छठ पूजा के खिलाफ नहीं है बल्कि छठ के नाम पर जो राजनीति हो रही है उसके खिलाफ हैं. बेशक छठ को लेकर मुंबई में सबसे ज्यादा राजनीति होती हो लेकिन अगर हम कोलकाता की बात करें तो वहां का माहौल बिल्कुल ही अलग है. पिछले चार दशक से वाम सरकार होने के कारण यहां पर छठ पूजा राजनीति से बची हुई है. कोलकाता से निकलने वाले हिंदी दैनिक सन्मार्ग के संपादकीय प्रभारी हरिराम पांडेय बताते हैं, " कोलकाता में छठ बड़े पैमाने पर मनाई जाती है. छठ के दिन उत्सवी माहौल हो जाता है लेकिन अभी तक इस पर्व पर राजनीति की कोई बात सामने नहीं आई है. हालांकि सरकारी स्तर पर छठ व्रतियों की सुविधा के लिए हर संभव प्रयास किए जाते हैं. गांधी घाट, बाबू घाट, फेरी घाट और दक्षिणेश्वर घाट पर छठ व्रतियों जन सैलाब देखने लायक होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशक कोलकाता में छठ को लेकर राजनीति न होती हो लेकिन उससे सटे पूर्वोत्तर के राज्यों में छठ पर राजनीति होने लगी है. पूर्वोंत्तर मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रवि शंकर रवि का कहना है कि पिछले 10 सालों में छठ को लेकर राजनीति की झलक मिलने लगी है. सबसे पहले असम गण परिषद की सरकार ने प्रफुल्ल महंथ के मुख्यमंत्रित्व काल में छठ के दिन एच्छिक छुट्टी की घोषणा की थी. इसके बाद हिंदीभाषियों का झुकाव महंथ सरकार की ओर बढ़ा था. इसको देखते हुए कांग्रेस के नेता भी छठ के दिन घाट पर देखे जाने लगे. अगर असम की भौगोलिक स्थिति को देखा जाए तो बराक घाटी, ब्रह्मपुत्र घाटी और पहाड़ी इलाकों में यहां की ज्यादातर आबादी रहती है. जिसमें बराक घाटी में बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोगों की संख्या है. इन्हीं लोगों के बल पर 10 हिंदी भाषी विधायक चुनकर विधानसभा में पहुंचते हैं. अगर पूरे पूर्वोंत्तर की बात की जाए तो तकरीबन 20 लाख हिंदी भाषी है. लेकिन असम को छोड़कर बाकी राज्यों में वे इतने मजबूत नहीं हैं. शायद यही कारण है कि वहां पर छठ के नाम पर राजनीति की झलक नहीं के बराबर दिखती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह दक्षिण के राज्यों में भी धीरे-धीरे छठ करने वालों की संख्या बढ़ रही है. लेकिन वहां छठ को लेकर फिलहाल कोई राजनीतिक गहमागहमी नजर नहीं आती है. बंगलोर में रह रहे रामध्यान प्रसाद का कहना है कि, यहां पर हिंदी प्रदेश के लोगों की संख्या कम होने के कारण छठ पर्व व्यापक रूप से नहीं मनाया जाता है. खुद उनका परिवार पिछले पांच सालों से मुहल्ले में छठ पूजा करता रहा है. लेकिन अब धीरे-धीरे छठ करने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है.&lt;br /&gt;जिस तरह से छठ जैसे सांस्कृतिक पर्व को राजनीतिक रंग में रंगा जा रहा है और इसको लेकर राजनीतिक बिसात पर लाभ-हानि का गणित बिठाया जा रहा है, उसको देखते हुए यह नहीं लगता कि छठ पर होने वाली राजनीति आने वाले दिनों में कम होगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;छठ पर्व की शुभकामना के साथ आपका&lt;br /&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट-इस आलेख का संपादित रूप द संडे इंडियन (हिंदी-भोजपुरी) में प्रकाशित हो चुका है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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राजनीति'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-3453242759052108594</id><published>2010-10-04T22:57:00.000-07:00</published><updated>2010-10-04T23:05:16.410-07:00</updated><title type='text'>और तब बिहारी होना मान की बात होगी: नीतीश कुमार</title><content type='html'>काफी लंबे अरसे बाद मैं आपको लिख रहा हूं। जब से बिहार विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा हुई है तब से मैं काफी व्यस्त हो गया हूं। पिछले करीब एक महीने से चुनाव संबंधी विभिन्न गतिविधियों ने मुझे घेर रखा है जिनमें उम्मीदवारों के चयन से लेकर पार्टी की तैयारी तक तमाम काम शामिल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हमेशा यह कहा है कि आगामी चुनाव पिछले सभी चुनावों से कई मामलों में अलग हैं। मेरा विचार है कि हमारे प्रदेश के लिए यह ’बनाओ या बिगाड़ो’ किस्म के चुनाव सिद्ध होंगे। राज्य के इतिहास में पहली बार इन चुनावों में ’विकास’ सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन कर उभरा है। आप में से हर एक को यह फैसला करना है कि विकास की इस गति को आगे भी जारी रखा जाए या फिर जात, बिरादरी व संप्रदाय के नाम पर फिर विकास को कुरबान करके फिर उसी अंधियारे दौर में लौट जाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ने हमेशा यही माना है कि इन चुनावों में विकास का मुद्दा ही सबसे आगे रहेगा और मुझे यह देख कर बहुत अच्छा लगा की आप में से अधिकतर लोगों के विचार भी मेरे जैसे ही हैं। हाल ही एक अखबार के सर्वेक्षण से यह जानकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि बहुत बड़ी संख्या में लोगों के विकास के पक्ष में अपनी प्रतिक्रिया दी है और विकास को ही चुनावों का सबसे अहम मुद्दा स्वीकार किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसा राज्य जहां चुनावों में बहुमत के लिए जात बिरादी के समीकरण बनाए जाते थे, वहां पर इस किस्म की राय सकारात्मक परिवर्तन की परिचायक है। दुनिया भर के लोग मुझे लिखते हैं और कहते हैं कि उन्होंने बिहार के कायापलट की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन हमारे कार्यकाल में जो सुधार हुए हैं उन्हें देखते हुए उनकी राय अब बदल गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने कार्यकाल के प्रारंभ में मैं ने बिहार वासियों से वादा किया था कि अगर मैं बिहार में बदलाव की बयार लाने में सफल न हो सका तो दोबारा वोट मांगने नहीं आउंगा। हालांकि मुझे यह कहने में संकोच हो रहा है किंतु हकीकत यह है कि आज पूरे राज्य में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। और यही वजह है कि मैं अपनी सरकार के एक और कार्यकाल के आपसे वोट मांग रहा हूं। हमने अभी बहुत थोड़ा हासिल किया है अभी तो लंबा सफर बाकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार में कार्य संस्कृति में बदल गई है। कानून व्यवस्था में लोगों का भरोसा कायम हुआ है। हमने गरीबों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, महादलितों व समाज के अन्य कमजोर तबकों के लिए कई कल्याणकारी काम किए हैं। आगे क्या करना है इस बात पर मेरी दृष्टि टिकी हुई है। हमें साधनहीन व हाशिए पर पड़ लोगों को सशक्त बनाना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि हम फिर से सत्ता में आते हैं तो हमारा पहला काम जनवितरण प्रणाली को मुक्कमल करना होगा। हमने फूड कूपन को लेकर कुछ प्रयोग किए हैं और मैं इस प्रणाली को जल्द से जल्द पुख्ता आकार देना चाहता हूं। मैं अपनी इस प्रतिबद्धता को दोहराना चाहता हूं कि हर गरीब को उसके हिस्से का राशन बिना किसी अड़चन के मिले। बिजली की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए मैं ज्यादा शिद्दत के साथ ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूं क्योंकि विकास के लिए यह मूलभूत आवश्यकता है और हम सभी इस बारे में बखूबी जानते हैं। हमने इस मुद्दे पर निरंतर काम किया है और अब जल्द ही परिणाम सामने आने लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे बताया गया है कि कई देशी व विदेशी निवेशक बिहार के चुनावों पर ध्यान केन्द्रित किए हुए हैं। मैं उन्हें फिर से यह आश्वासन देता हूं कि आगे आने वाले समय में निवेश तथा उद्योग के लिए हालात और भी अनुकूल हो जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन् 2015 तक बिहार को एक विकसित राज्य बनाने के लिए मैं कृतसंकल्प हूं। राज्य की विकास दर बहुत प्रभावशाली रही है और हम इसे आगे और बढ़ाएंगे। यह तब तक नहीं हो सकता जब तक कि हम सब मिलकर इस मुहिम के एक दूसरे का साथ नहीं देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा आप सब से विनम्र निवेदन है कि कृपया आप वोट देने जरूर आएं। आप के सहयोग से ही जनतंत्र मजबूत होगा और आपके योगदान से ही बिहार प्रगति व समृद्धि पथ पर अग्रसर होगा। सवाल यह नहीं है कि आप किसे अपना मत देते हैं लेकिन यदि आप अपने मताधिकार का बिना चूक इस्तेमाल करें तो निसंदेह यह हम सभी के हित में होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्यौहारों का मौसम है, दशहरा, दीवाली और छठ बस आने को हैं और त्यौहारों के इस मौसम में चुनाव पर्व भी घुलमिल जाएगा। आइए और बिहार के जज़्बे का जश्न मनाइए। इन त्यौहारों के दौरान अपने परिवारों के साथ मिल कर बिहार के भविष्य का फैसला कीजिए। आपका एक छोटा सा सरल प्रयास बिहार की नियति को तय करने में सक्षम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर हम पर आत्म संतुष्ट होने का आरोप लगाया जाता है। समय आ गया है कि उन आलोचकों को गलत साबित किया जाए। यही वक्त है कि विकास की ओर एक लंबी छलांग लगाने का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ने हमेशा कहा है कि एक ऐसा जीवंत व गतिशील प्रदेश का निर्माण करें जिस पर हमें गर्व हो। हमें बिहार को एक ऐसा राज्य बनाना है जिसकी बदौलत बिहारी कहा जाना गर्व का विषय बने। और तब बिहारी होना मान की बात होगी, अपमान की नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा की नीतीश कुमार ने अपने ब्लॉग(http://nitishspeaks.blogspot.com)में लिखा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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मौत या रुपइया!!!</title><content type='html'>मानवीय स्वभाव को समझना आसान नहीं है. इसे जितनी गहराई से  समझने का प्रयास करते हैं, उसी अनुपात में और उलझता चला जाता है, लेकिन कल (30 सितम्बर 2010)  एक ऐसी घटना घटी, आंखों के सामने कि इस मानवीय स्वभाव को समझने का एक और अवसर मिल गया. दोपहर के लगभग तीन बजे से लेकर रात्री के 8 बजे तक (अयोध्या मामले की रिपोर्ट देखने के लिए) टीवी सेट पर नजरें चस्पा किए रहने के बाद, मन में  सुरत- ए – हाल दिल्ली को देखने की जिज्ञासा हुई. मयूर विहार फेज 2 से बदरपुर (जहां मेरे भैया रहते हैं) जाने के लिए रुट संख्या 534 की बस से महारानी बाग पहुंचा. तकरीबन रात्री के साढे आठ बज रहे होंगे. सड़क पर चहल-पहल वैसी न थी, जैसा अमूमन हुआ करता है.   एक विरानी... सुस्ताई सड़क. जिस बस में बैठा था बमुश्किल 10-12 लोग रहे होंगे. रास्ते में दुकानें खुली नजर आ रही थीं, मगर खरीदार नदारद थे. कारण स्पष्ट था, 60 साल पुराने अयोध्या मसले पर फैसले का दिन जो था. हालांकि उस समय तक फैसला आ चुका था. न किसी की हार हुई थी और न ही कोई जीता था. किसी अनहोनी की आशंका ने लोगों को अपने-अपने घरों में कैद होने के लिए मजबूर कर दिया था. दिल्ली की सड़कों पर जो लोग नजर आ रहे थे उनके मन में भय का कहीं कोई भाव नहीं  था.  भारतीय नागरिकों की परिपक्वता झलक रही थी.  ठीक वैसे ही जैसा कि एनडीटीवी पर पंकज पचौरी, रवीश कुमार और कमाल खान के रिपोर्टों में झलक रही थी. खैर, मुझे आश्रम मोड़ से बदरपुर के लिए बस पकड़नी थी, सो मैं 534 न. की बस से महारानी बाग ही उतर गया. वहां से आश्रम मोड़ महज 200 मीटर की दूरी पर है. मैं पैदल ही जा रहा था. अचानक एक बाइक दुर्घटना ग्रस्त हो गई. उसकी जद में एक साइकिल सवार भी आ गया है. बाइक पर दो युवक थे,  एक के सिर में चोट लगती है, वह अचेतावस्था में चला गया. दूसरे को कम चोट लगी, वह उठा है और सीधे गाली देते हुए साइकिल सवार की ओर लपका. तब तक मैं और कुछ और राहगिर वहां पहुंच चुके थे. बाइक सवार को डांटकर उसे अपने दूसरे साथी को अस्पताल ले जाने की सलाह दी.  इसी बीच मैं स्टैंड में खड़े दिल्ली पुलिस के एक सिपाही को बुला लाया. वह आकर पीसीआर को फोन करता है. लेकिन इस दरम्यान अचेतावस्था में पड़े दूसरे बाइक सवार को होश आ जाती है. वे दोनों जाने की जिद करने लगते हैं. पुलिस वाला उनके जिद के कारण उनको जाने देता है. महज 12-13 मिनट बाद पीसीआर वैन आती है, लेकिन उसे बैरन ही लौटना पड़ता है. मैं साइकिल वाले से पूछता हूं, भैया आप ठीक हो न... वह जवाब देता है- हां, और बिना देर किए एक सवाल दागता है-"आपलोग उन दोनों के जाने क्यों दिए, उनसे कुछ पैसा लेता!!” यह सुनकर मैं भौचक रह गया. उपरोक्त दोनों घटनाओं ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आज आदमी को रुपए ने कितना मजबूर कर दिया है. जरा सोचिए जिस हाल में साइकिल सवार (अभी कुछ ही क्षण पहले वह मौत के चंगुल से निकला था) था, उस हाल में अगर उसे अपने सही सलामत बच जाने की जितनी खुशी नहीं है, उससे कहीं ज्यादा निराशा उन दोनों को छोड़े जाने से है. वह मौत के चंगुल में भी कुछ रुपयों की चाह रखता है. जरा सोचिए वह किस तंगहाली से गुजर रहा होगा? यह किसी इंसान के तंगहाली की पराकाष्ठा ही है, जहां वह अपने मौत के सदमे में भी रुपयों की चाह रखता है. दूसरी तरफ जरा गौर कीजिए पहली घटना पर जब एक दोस्त अपने चोट खाए दोस्त की चिंता छोड़कर एक साइकिल वाले को मारने के लिए दौड़ता है (जिसमें उसकी दबंगई की झलक मिलती है ). उस युवक (उम्र 20-22) के व्यवहार को हम अपने मध्यवर्गीय समाज के व्यवहार के  प्रतिकात्मक रूप से देख सकते हैं. जो अपने गलतियों को मानने के लिए तैयार नहीं है. निम्न मध्यम वर्ग से मध्यम वर्ग की श्रेणी में पहुंचे ऐसे लोग समाज में अपनी कुंठओं को प्रदर्शित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहते. शायद यहीं कुंठा उस युवक को एक असहाय साइकिल सवार पर हाथ उठाने के लिए प्रेरित कर रही थी.&lt;br /&gt; मानवीय व्यवहार के इस रंग को देखकर मैं खुद सदमे में हूं,  जहां पर आदमी के लिए रुपया साध्य हो गया है.  शायद इसी तरह के किसी अनुभव के बाद वेस्ट के राजनीतिक विचारक मैकियावेली को मानव स्वभाव के बारे में यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा कि, 'मानव अपने पिता के मौत के जिम्मेदार आदमी को तो माफ कर सकता है, लेकिन आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले को वह हरगिज माफ नहीं कर सकता.'&lt;br /&gt;खैर, अयोध्या पर फैसला आने के बाद की दिल्ली को देखने निकला था, सो देख लिया, जी भर के... &lt;br /&gt;और यह तो कह ही सकता हूं कि मंदिर-मस्जिद के मसले पर दिल्ली वालों के दिल पर अब राज़ तो नहीं ही किया जा सकता.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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भोजपुरिया क्षेत्र के आबादी पूरा राज्य के आबादी के लगभग 30 प्रतिशत बा.  तबो हमनी के अबहीं ले आपन बुनियादी जरूरत के पूरा करे खातिर राजनीतिक नेतृत्व प दबाव डाले में विफल रहल बानी जा. हमनी के हाथ में एतना ताकत बा कि राज्य के नेतृत्व के दिशा तय क सकत बानी जा. आजो हमनी के आपन भाषा, संस्कृति, तीज-त्योहार के संगे-संगे ना खाली देशे में बलुक पूरा दुनिया में आपन सशक्त उपस्थिति दर्ज करावेनी जा, बाकिर अपने घर में कमजोर बनल रहे खातिर अभिशप्त बानी जा. एकर कारण हमनी के नीमन से जानत बानी.&lt;br /&gt;अब समय आ गइल बा कि हमनी के आपन साख आ आपन हित के सुरक्षित राखे खातिर जागी जा. राज्य में चुनाव होखे वाला बा, फेर खादीधारी नेता हमनी के दुआर प हाथ जोड़ले अउर दांत देखावत लउकीहें.  हमनी के चापलूसी क के वोट हथिअइहें. बाकिर एह चुनाव में हमनी के प्रण लेवे के होई कि पिछला बेर जे विधायक रहल, उनका से रिपोर्ट कार्ड मांगल जाव आ नया उम्मीदवारन से क्षेत्र के विकास खातिर उनकर घोषणा के शपथ-पत्र मांगल जाव. अउर जे हमनी के एह पैमाना प खरा ना उतरे ओकर बहिष्कार कइल जाव. इहे अब एगो उपाय रह गइल बा हमनी के अपना भोजपुरियां क्षेत्र के फीजा में मीठास भरे आ खुशी के मोजराए खातिर अब एगो कठोर फैसला करे के पड़ीं. तबे राजेंद्र बाबू आ माहामाया प्रसाद के सपना के भोजपुरिया क्षेत्र में पल्लवित क पाइब जा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राउर&lt;br /&gt;- आशुतोष कुमार सिंह&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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&lt;br /&gt;भोजपुरिया लोगन के कुछ लोग गुमराह क रहल बा...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहिले हम 'इंटरनेटिया लोगन के मिलन आ अंजोरिया के अंजोर'&lt;br /&gt;शीर्षक से एगो आलेख बिहारी खबर में लिखलें रहीं. जवना आलेख प भोजपुरी के खेवनहार कहे वाला लोगन के एतराज भइल रहे. ऊ लोग धमकी भरल एसएमएस भेज के हमार लेखनी के रोके के प्रयासो कइलस. अइसन लोगन प हमरा तरस आ रहल बा, जे भोजपुरी के नाम प आपन दुकान चलावे खातिर बिना सोंचले समझले केहूं के कुछु कह दीहल आपन जीत समझ रहल बाड़े. एह लोगन के समझे के चाहीं की झूठ हमेशा से झूठ होखेला. हम भोजपुरी के पाठकन खातिर ऊ आलेख आज एहिजा दे रहल बानी अउर हमरा के गरियावे वाला लोगन से पूछे के चाहत बानी की ऊ लोग कवना स्कूल से भोजपुरी के पढ़ाई कइले बा कि ओकरा नीमनों बात बेजाएं लाग रहल बा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;'इंटरनेटिया लोगन के मिलन आ अंजोरिया के अंजोर'&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब रउआ ओइसन दोस्त से मिले जाए के होखे, जेकरा से रउआ कबो ना मिलल होखीं. बातचीत भइल होखे, उहो फोन से, विचार के आदान-प्रदान भइल होखे बाकिर इंटरनेट के माध्यम से. अइसे में मन में कइसन-कइसन सवाल उठ सकेला. अपना ओह दोस्त के बारे में जे दूर आ बहुत दूर बा. &lt;br /&gt;हमरो मन एह तरह के दोस्तन से मिले खातिर बेचैन रहे. बात पिछला 17 तारीख के हवे. जइसे कि रउआ लोगन के मालुमे होई कि जय भोजपुरिया डॉट कॉम (भोजपुरी के एगो सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट) आपन स्थापना के पहिला वर्षगाठ मनावे खातिर इंटरनेटिया मित्रन के दिल्ली के राजेन्द्र भवन में बोलवले रहे.&lt;br /&gt; तीन बजे से भोजपुरिया लोग राजेन्द्र भवन के लगे मंडराए लागल रहन. मजा त तब आइल जब दिल्ली जइसन अजनबी शहर में दूर-दूर से आइल लोग आपन चिन्हा-परची के लोगन के ढ़ूंढे के  कोशिश करत रहे. आंखन में एगो ललक रहे, ओह मित्र से मिले के जेकरा से ऊ पिछला कई साल से इंटरनेट के माध्यम से बतियावत आइल रहे. गजब के माहौल रहे. &lt;strong&gt;हालांकि एह मिलन समारोह में मुश्किल के 150 से 200 लोग पहुंचल रहे, बाकिर भोजपुरी के प्रति ई ओह लोगन के  दिवानगिए रहे कि केहू कोलकाता से आइल रहे त केहू अंबाला से, त केहू पटना से. एह मिलन समारोह के खास बात ई लउकल कि एह आयोजन में केहू खास आदमी के ना बोलावल गइल रहे. बिना जादा तड़क-भड़क के साधारण रूप में लिट्टी-चोखा खिला के ई कार्यक्रम खतम भइल.&lt;/strong&gt; इंटरनेटिया मित्रन खातिर ई एगो अजब प्रेम के गजब कहानी जइसन अनुभव रहे.&lt;br /&gt;भोजपुरी के एह कार्यक्रम में हम स्पेस के एगो कार्यक्रम में भाग लेहला के बाद पहुंचल रहीं. स्पेस श्रेष्ठता दिवस के अवसर प आपन सदस्य लोगन के आमंत्रित कइले रहे. एह मौका प जानल-मानल साहित्यकार प्रयाग शुक्ल जी से संवाद करे के मौका मिलल. प्रयाग जी आपन जिनगी में भोगल सांच के आधार प के एगो सूत्र वाक्य कहनी कि, प्रेम से बढ़ के एह दुनिया में कुछो नइखे. जब हम भोजपुरी के कार्यक्रम से बहरी निकलनी त हमरा मन में आइल कि प्रयाग जी एकदम सही कहत रहीं कि प्रेम से बढ़ के कुछो नइखे. ई प्रेम आ स्नेहे नू हवे कि कहां-कहां से आपन इंटरनेटिया मित्रन से मिले खातिर लोग दिल्ली पहुंचल बा.&lt;br /&gt;एही बीच भोजपुरी खातिर एगो अउर उपलब्धी भरल दिन 19 जुलाई के आइल, जब अंजोरिया डॉट कॉम आपन सात साल के सफर के पूरा क के आठवां साल में प्रवेश कइलस. अंजोरिया डॉट कॉम के संपादक ओपी सिंह आपन संपादकीय टिप्पणी में लिखलन कि, एकर शुरुआत जब भइल रहे तब दू तीन गो साइट अंगरेजी में भोजपुरी प जरुर रहे बाकिर फान्ट के लफड़ा के चलते केहू भोजपुरी में साइट चलावे के ना सोचले रहे. अंजोरिया ओह दौर से गुजरल फेर जब यूटीएफ फान्ट सुलभ हो गइल तब एकरा के अपनावे में तनिको देरी ना लगावल गइल. अब त पूरा दुनिया के हर कम्प्यूटर प देवनागरी बा, दुनिया के हर भाषा में साइट उपलब्ध बा, बाकिर पहिलका होखे के उल्लास आ अनुभूति कुछ दोसरे होखेला. कबो केहू कवनो पुरस्कारो से ना नवाजल अंजोरिया के! वइसहूं भोजपुरी में दोसरा के पुरस्कार बड़ा बेमन से दीहल जाला. एक बात के अरमान जरूर रहल कि भोजपुरी खातिर काम करे वाला लोग एकरा के एगो पहचान जरुर देव, एकरा के आपने समझो.&lt;br /&gt;ओपी जी अंजोरिया के आज ले कवनो पुरस्कार ना मिलल त का भइल! अंजोरिया के देश-दुनिया के भोजपुरियन के प्यार आ स्नेह त मिलते बा. ओइसहूं नीमन काम करे वालन के हमनी के समाज देर से याद करे ला. बाकिर इहो सांच बा कि नीमन काम करे वाला लोगन के समाज देर-सबेर ओकर सम्मान जरूर देला. एह से अंजोरिया के भोजपुरिया लोगन खातिर आपन मंच एही तरह से खोल के राखे के चाहीं. पुरस्कार के चरचा से हमरा याद आइल कि जब हम हाले में इंदू शर्मा पुरस्कार से नवाजल गइल वरिष्ठ साहित्यकार हृषीकेश सुलभ जी के उहां के पुरस्कार मिलला प आपन खुशी जाहिर करत बधाई देनी त उहां के जवाब रहे कि, रउआ लोगन के खुशिए हमार पुरस्कार बा. हृषीकेश सुलभ जी के उहां के कथा संग्रह वसंत के हत्यारे खातिर बरिस 2010 के इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित कइल गइल. उहां के ई सम्मान लंदन के हाउस ऑफ कॉमंस में 08 जुलाई के आयोजित समारोह में दीहल गइल. 15 फरवरी 1955 के बिहार के सिवान जिला में जन्मल कथाकार, नाटककार, रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ जी पिछला तीन दशकन से कथा-लेखन, नाट्य-लेखन, रंगकर्म के साथे-साथे सांस्कृतिक आन्दोलनो में सक्रिय भागीदारी निभवले बानी. &lt;br /&gt;अंत में इहे कहे के चाहत बानी कि भोजपुरिया लोग आपस में प्यार के गंगा में नहात-धोवात रहे आ भोजपुरी माटी के एही तरह नाम रौशन करत रहे.&lt;br /&gt;राउर&lt;br /&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट-बोल्ड कइल गइल पंक्तियन प जय भोजपुरिया डॉट कॉम के आपत्ति बा. एह लोगन से त हम इहे कहे के चाहब कि भाई लोग अगर रउआ लोगन के भोजपुरी से तनको मोह बा त भोजपुरिया लोगन के गुमराह कइल छोड़ दीं लोग, ना त इहे भोजपुरिया लोग जवन एह बेरा रउआ लोगन के बरियार पक्ष बाड़ें, ऊ कमजोर पक्ष बन जइहें.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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काहे हमनी के मुंह उठा के दिल्ली के ओर भाग रहल बानी जा. ई ठीक बा कि दिल्ली के देश के राजधानी हिय आ एकरा प हरेक हिंदुस्तानी के समान रूप से अधिकार बा. बाकिर जब हम ई देखेनी कि दिल्ली के संस्कार हमनी के संस्कार के खतम क रहल बा त बड़ा दुख होखेला. दिल्ली के कहे खातिर त दिल वालन के शहर कह जाला बाकिर दिल्ली के सच्चाई ई बा कि एकरा लगे दिल छोड़ के सब कुछ बा.&lt;br /&gt; हम आपन पिछला आलेख "दिल्ली नीयन रउओ बढ़ाई भोजपुरी के शान" के अंतर्गत एहिजा बसल भोजपुरिया लोगन के सराहना कइले रहीं. काहे कि एह लोगन में अबहियों आपन माटी के प्रति लगाव बा. आ भोजपुरी के सम्मान दिलावे खातिर आजुओ ऊ लोग संघर्ष क रहल बा. बाकिर आज हम दिल्ली(कथित अमीर लोग) के बात क रहल बानी. तनि चिंता हमरा आपन भोजपुरी भाइयनो के लेके बा. काहे कि आज उहो दिल्ली वालन के राह प चले के चाहत बाड़न. अउर उनकर   इहे चाहत उनका से उनकर संस्कार के हरण क रहल बा. ऊ गांव से दूर हो रहल बाड़न. माई के दुलार से दूर हो रहल बाड़न. बाबूजी के आशीर्वाद से दूर हो रहल बाड़न. जवना के नतीजा ई भइल बा कि लोरी सुना-सुना के बाबू के सुतावे वाली माई के आंख में लोर बा. अउर ओह लोर के पोंछे वाला केहू नइखे. अइसन नइखे आपन माई आ माटी के भुलाए वाला लोग बहुत खुश बा. उनकरो स्थिति बहुत दयनीय बा. ओकर स्थिति दीवार फिलिम के अमिताभ बच्चन जइसन बा जवना में अमिताभ के लगे गाड़ी बा बंग्ला बा, सबकुछ बा बाकिर माई के दुलार आ प्यार नइखे. बाकिर शशि कपूर के लगे दुनिया के सबसे बड़ दौलत माई के प्यार आ दुलार बा. &lt;br /&gt;हम त आपन भाई लोगन से इहे कहे के चाहत बानी की रउआ लोग चाहे मुंबई, चेन्नई, कोलकात्ता, दिल्ली चाहे दुनिया के कवनो कोना में रहीं बाकिर आपन भोजपुरिया मिठास के बनवले रहीं. ओकरा  में माहुर मत घोलीं. ना त एक दिन अइसन आई जब राउर लइका-पतोह रउए के हिंदी फिलिम 'अमृत' के राजेश खन्ना(अमृत शर्मा) आ कमला सक्सेना नीयन घर से निकाल के फेक दीहन स.&lt;br /&gt;खाशतौर से हम मेट्रो शहरन में रहे वालन भोजपुरिया नवजवानन से ई निहोरा करे के चाहत बानी कि रउआ सभे कुछो करे के पहिले आपन माई-बाबू आ आपन जनम भूमि के जरूर इयाद क लेब. अउर जब नींद ना आवे त दादा-दादी, नाना-नानी आ माई -बाबूजी के लोरी के जरूर इयाद क लीह लोग. शायद तोहार बेचैन मन के शांति मिल जाव.&lt;br /&gt;जात-जात वरिष्ट भोजपुरी लेखक प.कामता नाथ दूबे के श्रंद्धांजलि. उहां के पिछला 11 जून के 81 साल के उमिर स्वर्गवास हो गइल. उहां के गोपालगंज जिला के भरकुइया बरौली गांव के रहे वाला रहीं. उहां के भोजपुरी आ हिंदी में कई गो नाटक आ कहानी लिखले रहनी. 1998 में नेहिया लगवनी सइया से फिलिम के उहां के प्रोड्यूसरो रहीं. भगवान उहां के आत्मा के शांति देस.  &lt;br /&gt;ठीक बा त अब हम चलत बानी. अगिला हफ्ता फेर आइब एगो नया बात के संगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राउर &lt;br /&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;br /&gt;संपर्क&lt;br /&gt;bhojpuriamashal@gmail.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;91-9891798609&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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शायद नहीं, दे भी नहीं सकता. धरती पर मानव समाज के उत्थान और पतन का गवाह पुरूष-महिला संबंध ही रहे हैं. अब क्या ये संबंध टूटने लगें है? क्या मानव की कोई नई कहानी लिखने की तैयारी हो रही है? ये सारे सवाल हैं जिनका जवाब हमें तलाशने होंगे.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और सवाल है कि आखिर महिला, महिला के प्रति और पुरुष, पुरुष के प्रति आकर्षित क्यों होने लगे हैं? केवल दैहिक सुख कारण है अथवा कुछ और भी कारण हैं. सामाजिक कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं. समाज में पुरूषों का महिलाओं पर किए गए अत्याचार के परिणाम स्वरूप लेस्बीयन संबंधों के रुप में सामने आए हों ऐसा भी हो सकता है. उसी तरह महिलाओं के बदले हुए रूप ने शायद पुरूषों को भी गे संबंधों की तरफ ढकेला हो. महिलाएं अपने महिलापन का दुरुपयोग करने लगी हैं. शायद यह उनका प्रतिशोध हो. पर इसमें वे यह भूल जाती हैं कि इसके चक्कर में वे अपना मूल स्वभाव ही भूलती जा रही हैं.&lt;br /&gt; &lt;strong&gt;आज करियर का दबाव पुरूष और महिला दोनों पर है. करियर बनाना है तो लंबे समय तक बाहर रहना ही पड़ेगा. कई लोगों का तो यहां तक कहना हैं कि करियर के चक्कर में लड़कियां जिस हॉस्टल में रहती हैं वहां पर वे अपने सबसे नजदीकी सहेली का सहयोग अपने सेक्स पीपासा को शांत करने के लिए लेने लगती हैं. यह दैहिक सुख उनको पुरूष शरीर की मांग को बहुत हद तक कम कर देता होगा. ऐसी स्थिति उन लड़कियों के साथ ज्यादा है जिनका कोई पुरूष मित्र नहीं है, अगर है भी तो दोस्ती उस स्तर की नहीं है जहां पर संभोग की स्थिति पैदा हो सके. चूंकि एक चरम बिंदू पर सेक्स निहायत जरुरी हो जाता है. यह बात महिला-पुरूष दोनों पर लागू होता है. ऐसे बिन्दू पर संकोची लड़कियां अपने पीपासा को शांत करने के लिए अपनी सहेलियों पर निर्भर हो जाती है. ठीक ऐसा ही गे संबंधों में भी होता रहा है. &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इस तरह के संबंधों के पीछे अवसाद भी एक कारण है. जब महिला या पुरूष अवसाद ग्रस्त होते हैं और साथ-साथ अकेलेपन की गिरफ्त में आ जाते हैं तब वे शांति की खोज में निकल पड़ते हैं. इसी खोज में जो सबसे ज्यादा नजदीक आ गया चाहे वह सेम सेक्स वाला ही क्यों न हो, उसके साथ संबंध बनने की संभावना बढ जाती है. &lt;br /&gt;सेक्स के जरूरत से इन्कार नहीं किया जा सकता है. जब अपोजिट सेक्स का साथ नहीं मिलता है तब ये समान सेक्स में ही अपने कुंठित इच्छा को तुष्ट करने का प्रयास करने लगते हैं. यहीं प्रयास सेम सेक्स संबंधों के रूप में शायद सामने आता है.&lt;br /&gt;दिल्ली हाईकोर्ट का यह कथन कि मानव–मानव के बीच का संबंध चाहे वह समान सेक्स का ही क्यों न हो गैरकानूनी नहीं है. एक तरह से सही ही है.  पर क्या इसको प्राकृतिक कानून के खिलाफ नहीं कहा जा सकता! किसी भी काम को करने के पीछे उससे कुछ फल प्राप्ति की चाह होती है. महिला-पुरूष के संबंधों के साथ भी फल प्राप्ति की चाह जुड़ा हुआ पक्ष है.&lt;br /&gt;महिला-पुरूष को समाज ने शादी करने और साथ-साथ रहने के लिए छूट दे रखा है. यह छूट सिर्फ इसलिए नहीं है कि हम आजाद हैं तो कुछ भी कर सकते हैं बल्कि इसलिए है कि हम जिस सामाज में रहते हैं उस समाज को बनाए रखने वाला उत्तराधिकारी चाहिए. कहने का मतलब है कि हम या आप तभी सामाजिक अथवा असामाजिक कहे जा सकेंगे जब यह मानव समाज बचा रहेगा. मानव समाज कि जब हम बात करते हैं तो महिला-पुरूष और दोनों गुणों के मालिक किन्नर सभी आते हैं. बीच वाले अर्थात् हिजड़ों के साथ समस्या यह है कि वे संतान उत्पन्न करने में मेडिकली सक्षम नहीं होते हैं. इसलिए इनकी एक अलग पहचान है. लेकिन जो शौकिया प्राकृतिक नियमों की अवहेलना कर रहे हैं उनका क्या होगा! बेशक ऐसे लोगों &lt;strong&gt;को भारत सहित दुनिया के 127 देशों में अप्राकृतिक संभोग की कानूनी मान्यता मिल गई हो पर प्रकृति के कानून से इनको कौन बचायेगा? प्राकृतिक मिलन न हो पाने की स्थिति में क्या वे लोग अपने आप को पुरूष अथवा महिला कह पाने के स्थिति में होंगे! जो महिलाएं मां नहीं बन पाती हैं उनको बांझ कहा जाता है, पर जो बनने के स्थिति में है पर फैशन के फेर में अपने इस कर्तव्य से मुक्त होना चाहती हैं, उनको क्या कहा जाए? विज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि विपरित सेक्स वाले अगर स्नेह पूर्वक रहते है तो उनका विकास तेजी से होता है.&lt;/strong&gt; मानसिक परेशानी दूर रहती है. वैसे भी यह कहा जाता रहा है कि किसी भी सफल पुरूष के पीछे किसी महिला का हाथ और सफल महिला के पीछे किसी पुरूष का हाथ होता है. यह बात भी सच है कि सेक्स ही वह धागा है जो महिला पुरूष को आपस में जोड़े रखता है. ऐसे में अगर यह धागा ही टूट जायेगा तब निश्चित रूप से पारिवारिक ढांचे टूटने शुरू हो जायेंगे. &lt;br /&gt;समाज की पहली इकाई परिवार होता है. जब परिवार का ही अस्तिव खतरे में हो तो समाज को बचा पाना मुश्किल है. वैसे देखा जाए तो परिवार शब्द अपने आप में व्यापक अर्थ रखता है. क्योंकि हम जिस शक्ति की संताने हैं उस आधार पर पूरा मानव एक परिवार ही तो है. भले हम इस परिवार को संकुचित अर्थों में ले तो कह सकते हैं कि मां-बाप और उनके बच्चे बस बन गया परिवार. परिवार के विकास क्रम में मां-बाप का योगदान अहम होता है. पर गेवाद और लेसबियनवाद के बाद मां-बाप का युगल जोड़े का का टूटना शुरू हो जायेगा. जब परिवार की धूरि ही टूट जायेगी तब समाज का क्या होगा? भविष्य की भयावहता को बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है.&lt;br /&gt; वैसे भी व्यक्तिवाद ने संयुक्त परिवार की अवधारणा को लीलना शुरू कर दिया है. या यूं कहा जाए की बहुत हद तक लील चूका है. दादा-दादी की कहानियों से आज के बच्चे अनजान हैं. परी कथाओं को नहीं सुने हैं. लोरी क्या होती है इसको उन्होंने नहीं जाना है. जिन्दगी की सच्चाइयों को मेट्रो शहरों की जिन्दगी ने छुपा लिया है. शहर का प्रभाव गांव की ओर लगातार बढ़ता जा रहा है. सड़कें बन रही हैं. बसे सरपट दौड़ रही है. सब भागम-भाग में है. सब कुछ पाने की जुगत में है. भले ही उनको यह मालूम न हो कि वास्तव में उनको पाना क्या है?  ठीक कस्तूरी मृग की तरह. इस भागम -भाग में कब मां-बाप, दादा-दादी, टोला-मोहल्ला, संकरी गलियां, सरसों के फूल, आम के मंजर, कोयल की कूक, नदी की धारा, सब के सब शहर की भेंट चढ़ जाते हैं, मालूम ही नहीं चलता. इसका एहसास तब होता है जब शहर में पत्नी गर्भवती होती है. डॉक्टर कहता है कि इनको आराम की जरूरत है. अपने घर से अपनी मां या किसी बूजुर्ग को बुला लिजीए. इस वक्त किसी कोने में पड़ी मां की याद आती है. मां की याद आते ही गांव का वह सारा दृश्य एक-एक करके घुमने लगता है. हमें लगता हैं कि यहीं एक बिंदू है जहां पर मध्यवर्गीय परिवार को गांव की याद आती है. ऐसे में इस गेवाद के बढ़ने पर यह याद भी जाती रहेगी. क्योंकि तब न तो परिवार बढ़ाने की जरूरत होगी और न ही परिवार नियोजन की!! कहने का मतलब यह है कि पहले से ही टूट चुके पारिवारिक ढांचे को व्यक्तिवाद ने तो तोड़ा ही था. अब जब व्यक्तिवाद ही टूटने के कगार पर पहुंचने लगा है ऐसे में परिवार (विस्तृत अथवा संकुचित अर्थों में) को टूटने से कैसे बचाया जा सकता है?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गेवाद एक सामाजिक रोग है. इसको किसी भी आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता है.&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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बलुक जानबूझ के हमनी के समस्या के उत्पन्न क रहल बानी जा. &lt;br /&gt;आज हमनी के जल-जंगल आ जमीन से आपन नाता खतम करत जा रहल बानी जा. प्रकृति से दूर रह के विकास के परिकल्पना कइल जा सकेला?  हम भोजपुरियन में प्रकृति के नीयरा रहे के आदत रहल बा. हमनी के पुरनिया गाछ लगावे के हमनी के शिक्षा देत रहन आ ओह लोगन के बात प हमनी के अमलो करत रहनी जा. बाकिर अब हमनी के धीरे-धीरे पुरनिया लोगन के लगे बइठे से कतराए लागल बानी जा. बुजुर्ग अब हमनी खातिर बोझ हो गइल बाड़न. उनकर बात के हमनी के कुड़ा के टोकड़ी में डाल देले बानी जा. उनका के उनका हाल प अकेले छोड़ देले बानी जा. हमनी के एह बेरूखी से हमनी के भीतर धीरे -धीरे भोजपुरिया संस्कार के लोप हो रहल बा.  हमनी के ई भूला गइल बानी जा कि जेतना ज्ञान बुजुर्गन के लगे बा ओतना ज्ञान हमनी के कवनो लाइब्रेरी में ना मिली. अनुभव के जवन पूंजी होखेला ओकर मोकाबला केहू नइखे क सकत. एह से नया पीढ़ी के चाहीं कि आपन बुजुर्ग लोगन के नीयरा बइठस आ उनका से जिनगी जिए के गुरू मंत्र लेस. अउर अइसन खेत के तइयार करस जहवां राम जी के चिरई भर-भर पेट खा सको.&lt;br /&gt;हमनी से नीमन ऊ भाई लोग बा जे एह देश के छोड़ के दोसर देश में बस गइल बाड़न. एकरा बादो ऊ आपन माटी के नइखन भुलाइल. आपन पुरखा-पुरनिया के आजो इयाद क रहल बाड़न. जवना के एगो नीमन उदाहरण त्रिनिदाद आ टोबैको में देखे के मिलल. जहवां भारतीय मूल के खासतौर से बिहार के लोग भोजपुरी के पहिला कवि संत कबीर दास के 613वां जनम दिन बहुते धूम-धाम से मनवल. दोसर ओर हमनी के बानी जा हमनी के आपन पुरखा-पुरनिया के भुलात जा रहल बानी जा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर एह सब बातन के अलावा भोजपुरी खातिर एगो नीमन खबर बात ई बा कि कान फिलिम फेस्टीवल में भोजपुरी फिलिम आपन झंडा गाड़े में सफल रहल बिया. अइसन पहिला हाली भइल बा जब कान फिलिम समारोह में भोजपुरी फिलिम के एंट्री मिलल होखे. एकरा बाद ई मानल जा रहल बा कि एह से भोजपुरी फिलिमन के विश्व सिनेमा में आपन उपस्थिति दर्ज करावे में मदद मिली.  भोजपुरी फिलिम के कान तक ले जाए में अभिनेता रवि किशन के अहम योगदान रहल बा. रवि किशन के भोजपुरी फिलिम 'जला देब दुनिया तोहार प्यार में' एह बरिस के कान फिलिम समारोह के ऑफिशियल एंट्री में शामिल भइल बिया. रोचक तथ्य ई बा एह फिलिम के एगो अमेरिकी कंपनी पुन के सहयोग मिलल बा, जवना के वजह से एह भोजपुरी फिलिम के कान समारोह स्थित भारतीय मंडप में स्थान मिलल.  भोजपुरी फिलिम जगत खातिर ई एगो बड़ उपलब्धी बा. एह सफलता के बाद भोजपुरी सिनेमा के एगो नया दिशा त मिलबे करी. &lt;br /&gt;अब समय आ गइल बा जब हमनी के ई संकल्प ली जा कि हमनी के राम जी के खेत के राम जी के चिरई के भर भर पेट खाए लायक उपजाऊ बनाइब जा. आज अतने.. अगिला हफ्ता फेर मिलब.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; राउर &lt;br /&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपर्क&lt;br /&gt;bhojpuriamashal@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया में अपनी धाक जमाने वाले ब्रिटेन की कमान एक युवा डेविड कैमरन ने संभाला है. ब्रिटेन के पिछले 200 वर्षों के इतिहास में 43-वर्षीय डेविड कैमरन सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री हैं. लिबरल डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता निक क्लेग पिछले 70 सालों की पहली मिली-जुली सरकार में उप-प्रधानमंत्री बने हैं. वे भी 43 साल के हैं. दुनिया पर राज करने वाले इस देश पर अब युवा प्रधानमंत्री और युवा उप-प्रधानमंत्री राज करेंगे.&lt;br /&gt;भारत एक लोकतांत्रिक देश है. इसके संविधान से लेकर आचार-विचार सब पर ब्रिटेन का प्रभाव पड़ता रहा है. वैसे तो पूरी दुनिया में युवाओं के हाथ हरेक क्षेत्र में मजबूत हो रहे हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी युवा की श्रेणी में ही रखा जा रहा है. 2025 ई. तक दुनिया के सबसे ज्यादा ‘युवा शक्ति’ भारत के पास होगी.&lt;br /&gt;अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत अपने ‘युवा शक्ति’ का सदुपयोग कर पायेगा? क्या वह इसके लिए सामाजिक और राजनैतिक रूप से अपने को तैयार कर रहा है? क्या भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में इस ‘युवा शक्ति’ का योगदान रहेगा? क्या कलाम का वीजन 2020 सफल हो पायेगा?&lt;br /&gt;इन तमाम सवालों के बीच अगर कोई रौशनी दिखाई दे रही है तो वह है भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो कि 126 साल पुरानी पार्टी है, 1990 के दशक में बिखरने के बाद 21वीं सदी में अपने को मजबूत करने में बहुत हद तक सफल हुई है. इस सफलता के पीछे अगर स्व.राजीव गांधी की पत्नी और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी का अहम योगदान रहा है, तो राहुल गांधी (राजीव गांधी के पुत्र) और प्रियंका गांधी बढेरा (राजीव गांधी की पुत्री) का भी कम योगदान नहीं रहा है.&lt;br /&gt;राहुल गांधी आज भारत में ‘युवा शक्ति’ के प्रतीक बन गए हैं. वे जहां जाते हैं वहां युवा वर्ग उनको सर आंखों पर बैठा लेता है. चाहे वे यूपी के विश्वविद्यालयों का दौरा करे अथवा बिहार के, यूथ का प्यार एक जैसा उन्हें हर जगह मिलता है. &lt;b&gt;राहुल गांधी आज 19 जून को 40 साल के हो गए हैं&lt;/b&gt;. 19 जून 1970 को दिल्ली में जन्में इस नौजवान को जनवरी 2004 तक यह नहीं मालूम था कि वह भारत के राजनीति का एक उगता हुआ सितारा बनने वाला है. राजनीति में राहुल और उनकी बहन प्रियंका के संभावित प्रवेश के बारे में राजनीतिक गलियारों और मीडिया में जनवरी 2004 में अटकलों का दौर उस समय शुरू हुआ, जब वे अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी का दौरा करने गए,  जो कि उस समय उनकी मां (सोनिया गांधी) के नेतृत्व में था. उस समय राहुल गांधी पत्रकारों को अपने भावी रणनीति के बारे में कुछ भी बताने से साफ-साफ मना कर दिए. लेकिन यह कहने से नहीं चूके कि "मैं राजनीति के विरुद्ध नहीं हूँ. मैंने यह तय नहीं किया है की मैं राजनीति में कब प्रवेश करूंगा और वास्तव में, करूंगा भी कि नहीं." उनके इस बयान को राजनीतिक विश्लेषकों ने बहुत ही गंभीरता से लिया और यह कहा जाने लगा कि आने वाले समय में राहुल ही अमेठी की बागडोर संभालेंगे, और अपने राजनीतिक करीयर की शुरूआत करेंगे. यह बात बहुत जल्द ही साबित हो गई जब उन्होंने मार्च 2004 में,  मई 2004 का चुनाव लड़ने की घोषणा की और वे अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश के अमेठी से लोकसभा के लिए खड़े हुए और एक लाख से ज्यादा के अंतर से जीते भी. यूपी का उस समय जो परिणाम आया वह बहुत उत्साह जनक नहीं रहा 80 में महज 10 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को संतोष करना पड़ा. लेकिन राहुल गांधी का राजनीति में प्रवेश ने एक संदेश तो दे ही दिया कि अब भारत की युवा आबादी के बीच में कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक भाग्य पुनर्जीवित हो उठेगा. विदेशी मीडिया के साथ अपने पहले इंटरव्यू में, राहुल गांधी ने देश को जोड़ने वाले शख्सियत के रूप में स्वयं को पेश किया और भारत की "विभाजनकारी" राजनीति की निंदा की. साथ ही यह भी कहा कि जाति और धार्मिक तनाव को कम करने की कोशिश करेंगे. उनके ऐसे बयानों ने देश के युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को बढ़ाने में अहम योगदान दिया. 2006 तक उन्होंने कोई अन्य पद ग्रहण नहीं किया और अपने निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते रहे.  इस बीच भारतीय और विदेशी मीडिया में यह कयास लगाये जाने लगे थे कि इस युवा नेता को कांग्रेस कोई भारी-भरकम पद देने वाली है. &lt;br /&gt;जनवरी 2006 में,  हैदराबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सम्मेलन में, पार्टी के हजारों सदस्यों ने राहलु गांधी को पार्टी में एक और महत्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका के लिए प्रोत्साहित किया और प्रतिनिधियों को संबोधन की मांग की. राहुल ने बस इतना कहा कि, “ मैं इसकी सराहना करता हूँ और मैं आपकी भावनाओं और समर्थन के लिए आभारी हूँ. मैं आप लोगों को विश्वास दिलाता हूं कि मैं आपको निराश नहीं करूंगा".&lt;br /&gt;राहुल गांधी अब धीरे-धीरे भारत की राजनीति, यहां की सामाजिक संरचना और भूगोल को समझने लगे थे. इसीलिए कांग्रेस ने 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए एक उच्च स्तरीय अभियान का अगुआ उनको बना दिया. &lt;br /&gt; नई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से हाई स्कूल (1981 से 1983), रोलिंस कॉलेज, फ्लोरिडा से बी.ए.( 1994 में), ट्रिनिटी कॉलेज और  कैम्ब्रिज से, विकास अध्ययन में एम.फिल (1995 में) की पढ़ाई करने वाला यह नवजवान भारतीय राजनीति के पीच पर लगातार टेस्ट मैच खेलने का अभ्यास करता रहा. इसी बीच राहुल गांधी को 24 सितंबर 2007 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया. और इस युवक के कंधे पर भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) का निरिक्षण का भी दायित्व डाल दिया गया. इन दायित्वों को इस नवजवान ने बखूबी निभाया. आज स्थिति ऐसी हो गई है कि युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करने के लिये प्रत्येक जिला में एक कॉल सेंटर खोलने की बात चल रही है ताकि राहुल देश के युवा कर्णधारों से बात कर सकें और उनके संपर्क में रह सकें. &lt;br /&gt; राहुल गांधी द्वारा राजनीति के क्षेत्र में किए गए लाजवाब फिल्डिंग का ही कमाल था कि 2009 के लोकसभा चुनावों में, वे अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 3,33,000 वोटों के अंतर से पराजित करने में सफल रहे और साथ ही साथ चुनावों में कांग्रेस ने यूपी के कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 सीट जीतकर उत्तर प्रदेश में खुद को खड़ा करने की स्थिति में ला खड़ा किया. विदेशी विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने वाले इस नवयुवक पर यह आरोप लगाया जाता रहा कि वे भारत के राजनीतिक भूगोल को नहीं जानते हैं. यह बात 2004-5 तक कुछ हद तक सही प्रतीत हो रही थी लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में महज छह सप्ताह में देश भर में उन्होंने 125 रैलियों में भाषण देकर यह साबित कर दिया की अब वे भारतीय राजनीति और भारत के भूगोल को अच्छी तरह समझ गए हैं. &lt;br /&gt; &lt;b&gt;जब राहुल गांधी दलितों की बात करते हैं तो लगता है कि उन्होंने जो अनुभव किया, उसी को कह रहे हैं. जब राहुल समोसा खाने के लिये रास्ते में पड़ने वाले छोटी दुकान पर रूक जाते हैं, और एक आम आदमी की तरह समोसा खरीदते है तो लगता है कि राहुल आम आदमी को अब समझ चुके हैं. महाराष्ट्र एनएसयूआई के अध्यक्ष चुने जाने पर जब मनोज कांबले को राहुल पुणें फोन कर के बधाई देते हैं, तो ऐसा लगता है कि अब राहुल युवा नेतृत्व की शक्ति को समझ गए हैं. जब राहुल संसद के अंदर कलावती के दुख दर्द का बयान करते हैं, तब ऐसा लगता है कि राहुल एसी में रहने के बावजूद बाहर की दुनिया के मर्म को समझ चुके हैं. जब राहुल यह कहते हैं कि केंद्र द्वारा विकास मद में जारी किया जाने वाला पैसा पंचायत तक पहुंचते-पहुंचते 5 प्रतिशत ही बच पाता है, तो ऐसा लगता है कि अब राहुल को राज-काज की समझ भी आ गई है. जब राहुल अपने कार्यकर्ताओं पर विपक्षी दलों द्वारा किए गए किसी भी तरह के हमले का पूरजोर विरोध करते हुए नजर आते हैं, तो ऐसा लगता है कि उनमें संगठन चलाने की कला आ गई है. ऐसे में अब राहुल जो कुछ भी कहते या करते हैं उसको हल्के में नहीं लिया जा सकता. राहुल अब परिपक्व हो चुके हैं और उनको एक दक्ष राजनीतिज्ञ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए. हमें नहीं लगता की इससे किसी को कोई हर्ज होगा. &lt;/b&gt; &lt;br /&gt;आज राहुल गांधी की युवा टीम में आरपीएन सिंह, मीनाक्षी नटराजन, कनिष्क सिंह, सचिन पायलट, मनीष तिवारी, मिलिद देवड़ा, नितिन प्रसाद, प्रिया दत्त, रवनीत सिंह सहित 50 से अधिक ऐसे युवा चिंतक और रणनीतिकार हैं, जो उनके युवा भारत के सपने को साकार करने में दिन रात जुटे हुए हैं.&lt;br /&gt; राहुल आज जिस राजनीतक दौर से गुजर रहे हैं, ठीक ऐसे ही दौर से उनके पिता राजीव गांधी को गुजरना पड़ा था. सत्तर के दसक के अंतिम सालों और अस्सी के शुरूआती दिनों में कांग्रेस आपातकाल के सिंड्रोम से ऊबर नहीं पाई थी और उसकी हालत ठीक नहीं थी. इसी बीच राजीव गांधी अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ विदेश रहने चले गए थे. जब राहुल के चाचा संजय गांधी एक विमान दुर्घटना में मारे गए, तब मां इंदिरा गांधी को सहयोग करने के लिए राजीव गांधी को भारत आना पड़ा. 1982 ई. में राजीव गांधी जो कि एक पायलट के रूप में अपनी पहचान बनना चाहते थे, को राजनीति में आना पड़ा. और अमेठी से लोकसभा का चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे. तभी भारतीय राजनीति के लिए एक काला दिना आया, जब भारत की लौह महिला के नाम से मशहूर हो चुकी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षकों ने ही मार गिराया. 31 अक्टूबर 1984 का सफेद-स्याह दिन, एक तरफ भारत की राजनीति का एक मजबूत स्तंभ गीर चुका था, दूसरी तरफ भारत की राजनीति में एक युवा नेता का उदय हो रहा था. जिसका नाम था राजीव गांधी. राजीव गांधी को भारत का प्रधानमंत्री बना दिया गया और वे 2 दिसंबर 1989 तक इस पद पर बने रहे.&lt;br /&gt;उसके बाद उनको भी भारत का भूगोल दिखाने और समझाने के लिए गांव-गांव का सफर कराया गया था. उस समय मणिशंकर अइययर उनके सबसे विश्वासपात्रों में से एक थे. वे उनको गरीबों की बस्तियों में ले जाया करते थे. और धीरे-धीरे राजीव गांधी को भारत के भूगोल का ज्ञान होने लगा था.  जब तक यह युवा देश का प्रधानमंत्री रहा, उस समय तक देश के युवाओं का पसंद बना रहा. ठीक ऐसा ही राहुल गांधी के साथ भी हो रहा हैं. उनको भी देश के भूगोल को समझने और राजनीतिक समझ विकसित करने के लिए भारतीय सामाज के प्रयोगशाला में परिक्षण के लिए डाला गया हैं. अभी तक जितने भी शुरूआती रूझान आए हैं उसमें राहुल गांधी नामक तत्व अपने को साबित करने में सफल रहा हैं.&lt;br /&gt;लेकिन असली परीक्षा 2014 के लोकसभा चुनाव में होगी. जब राहुल गांधी के कंधो पर देश के प्रधानमंत्री का दायित्व निभाने के लिए संभतः कहा जायेगा!! अगर राहुल राष्ट्रपति के पास 272 सांसदों का समर्थन पत्र लेकर पहुंचे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. क्योंकि राहुल गांधी जब से कांग्रेस में आए हैं तब से लगातार क्षेत्र में लोगों के बीच देखे जा रहे हैं. और राजनीतिक विश्लेषकों का यह मत हैं कि वे 2014 आते-आते इतना शक्तिशाली तो हो ही जायेंगे कि उनके हाथ में देश की बागडोर हो.&lt;br /&gt;राजीव गांधी 40 साल 2 महीने और 11 दिन में भारत के प्रधानमंत्री बन गए थे. उस समय उनके पास जमीनी धरातल पर महज दो-तीन सालों का राजनीतिक अनुभव था. खैर उस समय की स्थिति कुछ और बन गई थी, जब उनको प्रधानमंत्री बनना पड़ा था. लेकिन राहुल गांधी के पास 2014 तक 10 साल का राजनीतिक समझ हासिल करने की डिग्री होगी. यूथ कांग्रेस को मजबूत करने का सर्टीफिकेट होगा. देश की जनता का नब्ज टटोलने का अनुभव होगा और विरासत से राजनीतिक माहौल में जीते रहने का एहसास होगा. इन सबको मिलाकर अगर देखा जाए तो अगर राहुल कांग्रेस की सरकार बनने पर देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए.&lt;br /&gt;और शायद यहीं अब युवा भारत की मांग भी है और सोच भी है. जब ब्रिटेन की कमान युवा डेविड कैमरन को हाथों में जा सकता है तो भारत की कमान युवा राहुल के हाथ में क्यों नहीं?  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;(साथ में सोनी किशोर सिंह )&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपर्क&lt;br /&gt;zashusingh@gmail.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;91-9891798609&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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का इहे हमनी के असली भोजपुरी ह? फिलिम आ गीतन में जवन भोजपुरी बोलल आ गावल जा रहल बा ओह से भोजपुरी के फैलाव त होखत बा बाकिर एगो दोयम दर्जा के फूहड़ भासा के रूप में. त का रउआ लोग इहे चाहत बानी कि राउर पहचान दोयम होखे? राउर पहचान फूहड़ होखे? रउआ जब बाहर भोजपुरी में बात करीं त बाहरी लोग रउआ के असभ्य के रूप में देखे? रउआ बात के हल्का ढ़ंग से लीहल जाव? रउआ के बिहारी कह के भगावल जाव? अगर एह सब कुछ से अपना के बचावे के चाहत बानी त हमनी सब के एकजूट हो के आपन भासा आ संस्कार आ संस्कृति के लड़ाई लड़े के पड़ी. मुंह के ताला खोले के पडी़. तन-मन आ धन से एकरा खातिर जुटे के पड़ी.&lt;br /&gt; रउआ लोग देखत होखब कि एह घरी भोजपुरी के नाम एतना संस्था आ संगठन चल रहल बाड़ी जा कि ओकर गिनती कइल मुश्किल हो गइल बा. ई सब संगठन भोजपुरी के नाम प आपन रोटी सेकत बाड़न. भोजपुरी साहित्य के सांचहू में उत्थान करे खातिर अइसन कई गो लोग बा जेकरा के रउआ सब जानत बानी? हमरा समझ से अइसन लोगन के गिनती अंगुरी प हो जाई. भोजपुरी के भला खाली सभा आ सम्मेलन क लेहला भर से नइखे होखे वाला. भोजपुरी के पीड़ा के हम कई साल से अनुभव करत बानी. एही अनुभव आ दरद के हम पिछला दिनन दिल्ली आइल रहन अश्वनी कुमार सिंह(संपादक बिहारी खबर, राष्ट्रीय सप्ताहिक समाचार पत्र) से कइनी. हमार बात सुन के भोजपुरी के प्रति उनकर लगाव आ एकर स्थिति के देख के उनका मन में जवन दरद रहे ऊ साफ-साफ लउकल. लगभग चार घंटा तक ले एह सब मसला पर विचारन के आदान प्रदान भइल. एह संवाद के परिणाम ई निकलल कि हमनी के भोजपुरी के विकास खातिर दू गो माध्यम से काम करे प सहमत भइनी जा. आ एकरा खातिर दू गो अलग-अलग मंच के गठन करे के फैसला भइल. पहिला बनल ‘भोजपुरी साहित्य संग्रह समिति’, एह समिति के माध्यम से देश-विदेश में भोजपुरी में हो रहल लेखन कार्य के प्रोत्साहन देबे आ जेतना साहित्य बा ओकरा के संग्रह करे के काम कइल जाई. दूसर बनल ‘भोजपुरी अस्मिता मंच’ जवना के मुख्य उद्देश्य ई रखल गइल कि भोजपुरी साहित्य, संस्कृति आ संस्कार के जे केहू कवनो रूप में बिगाड़े के कोशिश करी ओकर विरोध कइल जाई. खासतौर से भोजपुरी गीतन आ फिलिमन में जे तरह से अश्लीलता परोसल जा रहल बा, ओकर हर संभव विरोध कइल जाई. साथे-साथे ई मंच भोजपुरी के आठवीं अनुसूचि में जगह दिलावे खातिरों जमिनी लड़ाई लड़ी. साथे-साथे ओह सब भोजपुरियन के एक मंच प लावे के प्रयास करी जे भोजपुरी के पीड़ा आ दरद के समझत बा. त रउआ सबे से ई गुजारिश बा कि रउआ लोग एह दूनों समिति आ मंच के हाथ आ नाक-कान बनीं. समय-सयम प हम एकरा बारे में रउआ सबे के बतावत रहब.&lt;br /&gt;त आज से ना अबहीं से रउआ सब कमर कस लीहीं. जय भोजपुरी जय भोजपुरिया के साथे हम आपन बात खतम करत बानी अगिला हाली एगो दोसर विषय के साथे रउआ सबे से फेर मिलब.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राउर&lt;br /&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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rel='alternate' type='text/html' href='http://aapandesh.blogspot.com/2010/06/blog-post_3074.html' title='आपन देश: गोविंद मूनिस के श्रद्धांजलि'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-5841526723833743086</id><published>2010-06-11T22:53:00.000-07:00</published><updated>2010-06-11T22:53:31.411-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोविंद मूनिस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नदिया के पार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्ती'/><title type='text'>गोविंद मूनिस के श्रद्धांजलि</title><content type='html'>&lt;b&gt;&lt;br /&gt;के ले जाई नदिया के पार...&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवनो भासा आ बोली के बढ़ावे में ओह भासा में बनल फिलिम के बहुते योगदान होखेला. फिलिम के कथानक ओह भासा आ बोली के संस्कार के परदा प उकेरे के काम करेला. अउर ई सब तबे संभव हो पावेला जब ओह फिलिम के कथा लिखे वाला आदमी ओह भासा आ बोली के संस्कार के &lt;br /&gt;समझत-बूझत होखे. ओह भासा आ बोली खातिर ऊ घरी बहुते दुखदाई होखेला जब ओकर मर्म के समझे वाला कवनो मर्मज्ञ एह दुनिया के अलविदा कह देला. ओकरा बाद खाली बच जाला ओकर याद अउर ओकर काज. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछला पांच मई के दिन हम रोज के नीयन दफ्तर से लौट के घरे पहुंचल रहीं. चाय के संगे गीत के मजा लेवे खातिर हम आपन एफएम के ऑन कइनी. कवन दिशा में लेके चला रे बटोहिया... नदिया के पार फिलिम के ई गाना बाजत रहे, मन गदगद हो गइल. बाकिर कुछ देर बाद रेडियो जॉकी ई खबर सुनवलस की नदिया के पार फिलिम के निर्देशक गोविंद मुनिस जी अब हमनी के बीच नइखी. हमार मन थोर हो गइल. एगो झटका लागल. ई झटका खाली हमरे ना लागल बलुक हिंदुस्तान के फिलिम जगत के सब लोगन के लागल जे मूनिस जी के संवाद आ निर्देशन के कायल रहे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुनिस जी के जनम 2 जनवरी 1929 के उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिला के पसखेरा में प.श्रीराम के घरे भइल रहे. उनका लइकाइएं से कथा-कहानी सुने आ पढ़े में मन लागे. एही से ऊ धीरे-धीरे कथा लिखे के ओर आपन कदम बढ़वलन. उनकर साहित्यिक जिनगी के शुरुआत 1947 में कानपुर के दैनिक विराट के रविवारीय संस्करण में छपल एगो लघुकथा से मानल जाला. एकरा बाद त गोविंद जी कबो पाछे मुड़ के ना देखलन. अखबारन में इनकर लेख छपे लागल. बांग्ला में इनकर अनुवाद कइल आलेख आ कहानी कई गो पत्र-पत्रिका में क्रम से छपे लागल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोविंद जी के जिनगी में एगो नया मोड़ ओह बेरा आइल जब ऊ अप्रैल 1952 में कलकत्ता गइलन, जहवां उनकर मुलाकात ऋतिक घटक से भइल. ऋतिक जी उनका लेखनी के पहिलहीं से कायल रहन आ ऊ उनकर काबलियत के जानत रहन. इहे कारण रहे कि ऊ मुनिस जी के अपना संगे सहायक निर्देशक के रूप आपन पहिला फिलिम बेदेनी(बंगाली फिलिम)में रखलन बाकिर ई फिलिम पूरा ना हो पाइल फेर बाद में ऊ नागरिक फिलिम में में काम कइलन. साल भर बाद 1953 में उनका सत्येन बोस के संगे बंबई जाए के मौका मिलल. मुनिस जी सत्येन बोस के निर्देशन में बनल लगभग सब फिलिमन में काम कइलन. मूनिस जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी आदमी रहन. शायद इहे कारण रहे कि ऊ सहायक निर्देशक के अलावा संवाद आ स्क्रीनप्ले लेखको के रूप में काम कइलन. सबसे रोचक बात त ई रहे कि ऊ कबो-कबो संगीतकारो के रूप में लउकलन. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्येन बोस के संगे जवना-जवना फिलिम में मूनीस जी काम कइलन ओकरा में जागृति, बंदीस, मासूम, चलती के नाम गाड़ी, दोस्ती (1964 जवना खातिर मूनीस को सबसे नीमन संवाद लिखे वाला के रूप में फिलिम फेयर अवार्ड से नवाजल गइल), आसरा, मेरे लाल, रात और दिन, आंसू बन गए फूल आ जीवन मृत्यु. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतने ना सत्येन बोस के फिलिमन के अलावा ऊ कई गो फिलिम जइसे उपहार आ राजश्री प्रोक्डशन के कई गो फिलिम में ऊ संवाद देलन. उनका काम से राजश्री प्रोडक्शन एतना प्रभावित भइल कि ऊ मुनीस जी के यादगार फिलिम नदिया के पार जवन कि 1982 ई. में बनल रहे के निर्देशित करे के मौका देलस. अउर ई फिलिम एतना सफल भइल कि एह फिलिम के मुख्य किरदार चंदर (सचिन)आ गूंजा(साधना सिंह) के संवाद पूरा भोजपुरिया समाज के हिला के राख देलस(हालांकि ई हिंदी फिलिम रहे बाकिर एकर टोन भोजपुरिया रहे आ कथानक भोजपुरिया क्षेत्र से जुड़ल रहे). ई फिलिम भोजपुरी संस्कार आ माटी के सुगंध के देश-विदेश में फइलावे के काम कइलस. एह फिलिम के पहिले मुनीस जी मट्टू प्रोडक्शन खातिर एगो भोजपुरी फिलिम मितवा (1965-66 ) निर्देशित कइले रहन. एह फिलिम के यूपी आ बिहार में मनोरंजन कर में छूटो मिलल रहे. एकरा बाद त फिलिमन के निर्देशन के एगो कारवां चल पड़ल. मूनिस दा निर्मला पिक्चर्स खातिर ससुराल, अमित फिल्मस खातिर बंधंन बाहों का, राजश्री प्रोक्शन खातिर बाबूल आ श्री चारभुजा प्रोडक्शन खातिर राग-अनुराग जवना के नाम बदल के साजन का दर्द क दीहल गइल. मूनीस जी बाल फिल्म सोसाइटी के फिलिम अनमोल तस्वीरो खातिर संवाद लिखनी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूनीस जी आपन कलम के जादू से ना खाली बड़ परदा के बादशाह बननी बलुक उहां के छोट परदा खातिरो आपन कलम चलइनी. दूर्दशन खातिर एगो टेलीफिलिम डॉन, दो एकेले, जी टीवी के सीरियल आ स्टार प्लस प प्रसारित होखे वाला मशहूर रामलिला सीरीजो खातिर स्क्रीनप्ले लिखलें. उनकर अंतिम निर्देशित भोजपुरी फिलिम गंगा जइसन पावन पिरीतिया हमार रहे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एतना व्यस्त रहला के बादो मूनिस जी आपन सामाजिक दायित्वो के नीमन से निबाहत रहन. मूनीस जी सामाजिक आ सांस्कृतिक गतिविधियन आ थियेटरो से लगातार जुड़ल रहन. ऊ प्रगति नामक सामाजिक आ सांस्कृतिक संस्था के प्रधान आ संस्थापकन में से रहन. जवना के स्थापना 1962 में भइल रहे. &lt;br /&gt;भोजपुरी फिलिम के पितामह कहाए वाला कुणाल सिंह कहलन कि ‘‘गोविंद जी हिंदुस्तान के आत्मा के समझे वाला निर्देशक रहन. उनका गइला से हिन्दुस्तान के फिलिम जगत के बहुत भारी क्षति भइल बा जवना के भरपाई भइल मुश्किल बा आ उनका नीयन निर्देशक आ संवाद लेखक हमरा नजर में एह बेरा फिलिम उद्योग में केहू नइखे.’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछला 5 मई के 81 बरिस के उमिर में हिंदी,बांग्ला आ भोजपुरी फिलिम में संवाद आ निर्देशन से जादू बिखेरे वाला जादूगर एह लोक से अलविदा कह देलस.&lt;br /&gt;आज मुनिस जी हमनी के बीच नइखीं. बाकिर उहां के हिंदुस्तानी फिलिम जगत खातिर कइल गइल काम दर्शकन के दिलो-दिमाग में कौउंध रहल बा. एह महान संवाद लेखक आ निर्देशक के गइला के बाद एह कमी के फिलिम जगत कइसे पूरा करी ई एगो अहम सवाल बा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट: ई आलेख द संडे इंडियन भोजपुरी में छप चुकल बा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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श्रद्धांजलि'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-6850608163115024468</id><published>2010-06-10T23:17:00.000-07:00</published><updated>2010-06-10T23:17:37.168-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भोजपुरिया मशाल 3'/><title type='text'>ई ह भोजपुरिया इंटरनेट</title><content type='html'>जइसे -जइसे विज्ञान के विकास भइल वइसे-वइसे ऊ मानव के रहन-सहन ओकर संस्कार आ ओकर सोचे के तरीका, सबकुछ बदल के रख देलस. आज ई विज्ञान के देन बा कि हमनी के कंप्यूटर के जुग में जिय तानी स. अउर त अउर इंटरनेट जब से आइल बा सब दुनिया के एगो मुट्ठी में समेट लेले बा.  हिंदी होखे चाहे अंग्रेजी इंटरनेट प एह भाषा के साहित्य के सागर बावे. बाकिर जब हमनी के आपन भोजपुरी भासा आ साहित्य के बात करीले जा त परिणाम उत्साहजनक ना लउकेला. अइसन बात नइखे की भोजपुरी में लिखात नइखे. बाकिर दुखद पक्ष ई बा कि भोजपुरी के लेखक इंटरनेट से कोसो दूर बाड़न. आजो ऊ कागज जियान करे खातिर अभिशप्त बाड़न. अउर त अउर नीमन प्रकाशक ना मिलला के कारण उनकर साहित्य उनका कोठरी में सड़ रहल बा. ओकर रखवइया केहू नइखे.&lt;br /&gt;बाकिर एह सब के बीच में कुछ लोग भोजपुरी के दुनिया के सामने पड़ोसे के कामो क रहल बाड़न आ कुछ करे के तइयारी में लागल बाड़न. पिछला 6-7 महीना में इंटरनेट प भोजपुरी में लिखे वालन के संख्या में बढ़ोतरी भइल बा. &lt;br /&gt;एहिजा हम कुछ वेबसाइट आ सोशल नेटवर्किंग साइटन के चरचा कइल नीमन समझत बानी. सबसे पहिले 'अंजोरिया डॉट कॉम' के बात करे चाहत बानी. एह वेबसाइट के चला रहल बानी बलिया के ओमप्रकाश सिंह.  भोजपुरी के लेके ई उहां के दिवानगिए कहाई कि ऊ एगो कमरा में एगो कंप्यूटर के सहारे आपन दोसर कामन से समय निकालके भोजपुरिया समाज से जुड़ल खबरन के हमनी तक पहुंचा रहल बानी. पिछला दिन उहां से बातचीत भइल रहे त ऊ बतावत रहनी कि हमरा त बलिया छोड़ के कहीं जाए के फूर्सेते नइखे मिलत. एही तरह जमशेदपुर में बइठ के एगो इंजिनियर भाई सुधीर कुमार भोजपुरिया डॉट कॉम चलावत बाड़न. मनोज तिवारी के डाक टिकट वाला प्रकरण के उजागर इहे भाई कइले रहन. अउर आज उनकर साइट भोजपुरी दुनिया में ठीक ठाक चल रहल बा. एही तरह दिल्ली में बइठ के पूर्वांचल एक्सप्रेस चला रहल बाड़न भाई कुलदीप श्रीवास्तव. इंटरनेट प भोजपुरी के प्रसार में इनको योगदान के कम नइखे आंकल जा सकत. एही तरह प्रभाकर पांडेय, मनोज भावुक, शैलेश मिश्रा, शशि सिंह, अभय कृष्ण त्रिपाठी, रशि्म सिन्हा, विद्युत मौर्या, उमेश चतुर्वेदी, मंतोष सिंह सहित अइसन कई गो ब्लागर बाड़न जे भोजपुरी के आपन-आपन ब्लॉग के जरिए &lt;br /&gt;देश-दुनिया में फइलावत बाड़न. एही तरह वरिष्ट पत्रकार आ द संडे इंडियन हिंदी-भोजपुरी के कार्यकारी संपादक ओंकारेश्वर पांडेय जी आपन भोजपुरी मूमेंट के जरिए दुनिया के लोगन के बीच में भोजपुरी के झंडा उठवले बानी. एही तरह 'बिदेशिया डॉट को डॉट इन' के माध्यमो से भोपजुरी साहित्य के प्रसार हो रहल बा. एह साइट के सलाहकार जानल-मानल साहित्यकार पांडेय कपिल जी बानी जेकरा के हाले में आगरा में सेतु सम्मान से नवाजल गइल रहलह, जबकि संपादक  निराला जी बानी आ एकर संरक्षक बीएन तिवारी (भाई भोजपुरिया) बाड़न आ एह साइट के समन्वयक पत्रकार प्रेम प्रकाश जी बानी. एही तरह भोजपुरी फिलिमन के खबर के परोस रहल बा भोजपुरिया फिल्म डॉट कॉम. &lt;br /&gt;एही तरह एगो अउर वेबसाइट बटोहिया डॉट कॉम सुभाष झा ले आवे वाला बाड़न अउर एही तरह एगो भाई भोजपुरी खोज डॉट कॉम शुरू करे जा रहल बाड़न. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एह सब लोगन के प्रयास से इंटरनेट के माध्यम से भोजपुरी कुछ हद तक देश दुनिया के लोगन के लगे पहुंच रहल बिया बाकिर अबहीं अउर प्रयास करे के जरूरत बा. दिल्ली में भइल एगो भोजपुरी सम्मेलन में भोजपुरी के जानल मानल साहित्यिक चेहरा कन्हैया प्रसाद जी कहले रहीं कि भोजपुरी के लगे अइसन-अइसन शब्द बा जवना के दोसर भासा मुकाबला नइखे क सकत. भोजपुरी के ई मिठास बनल रहो, ओकर विस्तार होखत रहो, घर-घर में भोजपुरिए में किलकारी लइका भर स. ई सब धरातल प ओह बेरा उतरी जब हमनी के आपन भोजपुरिया धरम के निभाइब जा. ना त आवे वाला समय में मालुम चली कि हमनी के नई पीढ़ी माई आ बाबूजी के मतलबे भूला जाई. आ ऊ डैड-मॉम के भासा बोले लगिहन. अउर तब जा के हमनी के कहब जा कि हमार लइका हमरा हाथ से बहक गइल बा. अगर आपन नयका पीढ़ी के नइखी लोग बहके देवे के चाहत त ओकरा में भोजपुरिया संस्कार भरे के प्रयास करी लोग. काहे कि भोजपुरिया संस्कार से संस्कारित लइका कबो मानवतावाद के खिलाफ नइखे जा सकत.  ईहे हमनी के आपन धरमो बा.&lt;br /&gt;अबहीं हाले में भोजपुरी फिलिम 'नदिया के पार' के कथा लेखक आ निर्देशक गोविंद मुनिस जी एह लोक से परलोक चल गइनी. भगवान उहां के आत्मा के शांति प्रदान करस आ उहां के परिवार जन के एह विपदा से उबरे के साहस देस.&lt;br /&gt;अंत में हम आपन इंटरनेट भाई लोगन से कहे के चाहत बानी कि रउआ लोग जादा से जादा भोजपुरी कंटेट वेबजाल प डाली लोग जवना से आपन भासा आ बोली के प्रवाह में अउर गति आ जाव. अब रउआ सभे से विदा होखे के वक्त आ गइल बा. अगिला हफ्ता फेर मिलब एगो अउर चरचा के साथे.&lt;br /&gt; राउर &lt;br /&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;br /&gt;संपर्क&lt;br /&gt;91-9891798609&lt;br /&gt;bhojpuriamashal@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" 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बाद'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-5725995973840985252</id><published>2010-06-04T05:00:00.000-07:00</published><updated>2010-06-04T05:00:52.063-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भोजपुरिया मशाल-2'/><title type='text'>भोजपुरिया मशाल-2</title><content type='html'>&lt;b&gt;‘दिल्ली’ नीयन रउओ बढ़ाईं ‘भोजपुरी’ के शान&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजपुरिया लोग धान के बिया जइसन होखेलन, जब ले उनका के एगो खेत से दोसर खेत में ना रोपल जाई, उनकर उपजाउपन ना बढ़ी (ई बात दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ावे वाला प्रमोद कुमार जी एगो मुलाकात के दौरान कहले रहनी). कहे के मतलब ई बा कि जइसे धान के बिया के उखार के दोसर खेत में रोपल जाला आ ऊ बहुत तेजी से खेत में लहलहा जाला, ओइसने खुबी बिहार आ खासकर के भोजपुरिया लोगन में देखे के मिलेला. जब ले ऊ आपन गांव आ जवार में रहेलन, तब ले उनका आपन शक्ति के आभासे ना होला, अउर जइसहीं ऊ आपन घर-दुआर के सीमा लांघ के बहरी कदम राखेलन ऊ ओहिजा आपन धाक जमा लेलन. एका पाछे अगर कवनो कारन बा त ऊ बा भोजपुरिया माटी के संस्कार. जब एह माटी के संस्कार लेके केहू बहरी के दुनिया से रू-ब-रू होखेला, त ओकर तेज आ आभा मंडल से लोग प्रभावित भइला बिना ना रह पावेलन. आ इहे प्रभाव ह, जवना के कारन बिहार से बहरी जाए वाला लोगन के प्रति दोसरा प्रदेश के लोगन के मन में जलन के भाव पइदा हो जाला. बिहार के लोगन जेतना मेहनती आ तर्क संपन्न आदमी दुनिया के कवनो कोना में नइखन.&lt;br /&gt;आज हम दिल्ली में रहे वालन भोजपुरियन के बारे में चर्चा करे के चाहत बानी.&lt;br /&gt;दिल्ली देश के राजधानी ह आ एहिजा देश के हर कोना से लोग आपन रोजी-रोटी के तलाश में आवेलन. एही तरह जब ‘चटकल’ में बारहमसिया ताला लटक गइल आ लोगन के रोजी-रोटी पुरब के देस से चलल बंद हो गइल, त बिहार के लोग पच्छिम के देस (दिल्ली) के ओर आपन बोरिया-बिस्तरा लेके चल देलन. ई दौर 1990 के दसक से शुरू भइल आ 21वां सदी के आवे-आवे एकर रफ्तार अउर तेज हो गइल. &lt;br /&gt;अउर आज हालत ई बा कि भोजपुरिया लोग दिल्ली के राजनीतिए ना बलुक एहिजा के सामाजिक ताना-बाना के भी प्रभावित करे के क्षमता में आ गइल बाड़न. एकर झलक रउआ एहिजा होखे वाला छठ के परब के देख के मिल जाई. बिहार में जे तरह से छठ मनावल जाला, ओकरा से कही जादा धूम-धाम से दिल्ली में छठ पूजा होखेला. छठ के दिने होखे वाला सांस्कृतिक कार्यक्रमन के मंच प उपस्थिति दर्ज करावे खातिर एहिजा के राजनीतिक दलन के बड़-बड़ नेता में होड़ लागल रहेला. छठ के शुभकामाना लिखल पोस्टर आ बैनर से पूरा दिल्ली पट जाला. चुनाव के दिनन में बिहार से राजनीतिक दल आपन कार्यकर्ता बोलावेलन आ कहेलन की ऊ लोग आपन रिस्तेदारन के इहां जाके ओहिजा पार्टी के पक्ष में माहौल बनावे लोग. पिछला दिल्ली विधानसभा के चुनाव में त बिहार के तत्कालिन प्रदेश अध्यक्ष राधामोहन सिंह (आपन कुनबा के साथे) त दिल्ली में आके पुरबिया वोट के भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण करे खातिर बजाप्ते कैंप कइले रहन. बाकिर बिहार आ पूर्वांचली लोगन के विधानसभा में पार्टी के ओर से समूचित टीकट ना मिलला के कारन दिल्ली में रहे वाला पुरबिया भाजपा से नाराज हो गइल रहन. दिल्ली के किराड़ी विधानसभा (जीत के लिहाज से सी ग्रेड) सीट से अनिल झा(पूर्वांचली चेहरा) के टीकट देके भाजपा पुरबियन आ भोजपुरियन के प्रति आपन कर्तव्यन के इतिश्री क लेले रहे. हालांकि एह सीट प अनिल झा पूर्वांचल आ भोजपुरी के नाम प जीत गइलन. बाकिर बाकी जगह भाजपा के हार के सामना करे के पड़ल रहे. हारला के बाद भाजपा के ई एहसास भइल कि बिहार-पूर्वांचल के लोगन के अनदेखा क के ऊ आपन जनाधार दिल्ली में नइखे बढ़ा सकत. ठीक एही तरह बिहार-पूर्वांचल के लोगन के दिल्ली प बोझ बतावेवाली दिल्ली के मुख्यमंत्री शीला दीक्षितो पुरबिया बोल बोले लगली आ दिल्ली में भोजपुरी-मैथिली अकादमी के स्थापना तक करा देली. अब भोजपुरी के संस्थागत रूप में देवे में भोजपुरी अकादमी जी-जान से लागल बा.&lt;br /&gt;कहे के मतलब ई बा कि भोजपुरिया लोग आपन मेहनत आ काज के प्रति समर्पण के चलते आज दिल्ली में आपन झंडा गाड़ रहल बाड़न. त बाकी देश आ विदेश में रहे वाला भोजपुरियनो के चाहीं कि ऊ एही तरह से आपन झंडा सब जगह फहरावस आ आपन देश आ आपन माटी के नाम रौशन करस. &lt;br /&gt; अउर एकरा खातिर आज से ना अबहीं से एगो संकल्प ले लेस की ऊ आपन भोजपुरी भाइयन के बीच में भोजपुरिए में बात करीहें, चाहे ऊ बस में जात होखस चाहे हवाई जहाज में. एह जगहा प हम स्व. श्रीराम शर्मा जी के कहल एगो बात कह के रउआ सब से विदा लेहब -&lt;br /&gt;हमनी के बदलब जा, त जुग बदली।&lt;br /&gt;हमनी के सुधरब जा, त जुग सुधरी।।&lt;br /&gt;अगिला हफ्ता एगो अउर चरचा के लेके आइब, तब तक खातिर अलविदा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राउर&lt;br /&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रउआ लोगन के सुझाव आ प्रतिक्रिया के इंतजार क रहल बानी.&lt;br /&gt;ईमेल-(bhojpuriamashal@gmail.com)&lt;br /&gt;91-9891798609&lt;br /&gt;साभार&lt;br /&gt;बिहारी खबर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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मशाल-2'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-5567248330902049578</id><published>2010-05-28T22:54:00.000-07:00</published><updated>2010-05-28T22:54:29.737-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भोजपुरिया मशाल'/><title type='text'>भोजपुरिया मशाल</title><content type='html'>&lt;b&gt;चलीं चलल जाव भोजपुरी सीखे&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजपुरी बोले वालन के एह देश आ दुनिया में कमी नइखे बाकिर भोजपुरी लिखे वालन के बहुते कमी बा. जब ले कवनो भासा के बोले के संगे-संगे लिखल ना जाई ओकर विस्तार ना होखेला. अउर शायद इहे कारण बा कि आज भोजपुरी के जवन सम्मान मिले के चाहीं ऊ नइखे मिलल. बाकिर एकरा बादो आज भोजपुरी के स्थिति में लगातार सुधार हो रहल बा. भोजपुरी के पढ़ाइयो देश-दुनिया में कई जगह शुरू हो चुकल बा. भोजपुरी भासा के एह रफ्तार में पंख ओह बेरा लाग गइल जब इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय(इग्नू) भोजपुरी भासा में फाउंडेसन कोर्स शुरू  कइलस. &lt;br /&gt;एतना बड़ विश्वविद्यालय भोजपुरी भासा के पढ़ाई शुरू कइले बा, ई खबर जान के निश्चित रूप से भोजपुरी भासियन के खुशी होई. भोजपुरी बिहार अउर उत्तर प्रदेश के अधिकांश भू-भाग के समृद्ध भासा हिय. ई स्वतंत्र  व्यापक, जीवंत आ हजारन बरिस से प्रवाहमान साहित्कि भासा हिय. शायद इहे कारण बा कि  इग्नू भोजपुरी भासा खातिर ‘आधार पाठ्यक्रम’ के परिकल्पना कइलस आ अब ओकरा के साकार क रहल बिया. आज हम इग्नू में पढ़ावल जा रहल एह पाठ्यक्रम के बारे में रउआ सब से बतियाइब.&lt;br /&gt;एह पाठ्यक्रम के चार खंडन में विभाजित कइल गइल बा. अउर चारों खंड के चार-चार गो ईकाइयन में बांटल गइल बा. पहिला खंड में भोजपुरी के सांस्कृतिक परिवेश आ भासा-तत्व बोध के बारे में बतावल गइल बा. संगे-संगे भोजपुरी के महान व्यक्तित्व जइसे देश के पहिला राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद आ कुंवर सिंह सहित कई गो लोगन के बारे में बतावल गइल बा. एह खंड के इकाई 2 में भासा आ लिपि के बारे में विस्तार से बतावल गइल बा, इकाई 3 में व्याकरण सिखावल गइल बा. इकाई चार में भोजपुरी साहित्य के इतिहास से लेके वर्तमान तक के यात्रा के वर्णन कइल गइल बा. ओहिजा दोसरा खंड जवना के नाम ‘साहित्यिक आस्वाद’ रखल गइल बा, के पहिला इकाई (ओइसे पांचवा) कविता के नामे समर्पित बा. जवना में महावीर प्रसाद द्विवेदी के सरस्वती पत्रिका में 1914 में छपल हीरा डोम के ‘अछूत की शिकायत’ कविता आ श्री रघुबीर नारायण के बटोहिया के अंश के सहित कई गो महत्वपूर्ण कविता के शामिल कइल गइल बा. इकाई 6 में जहवां कथा-कहानी पढ़ावल जा रहल बा ओहिजा इकाई 7 में निबंध परोसल गइल बा. इकाई 8 में एकांकी के दर्शन होखत बा, जवना में भिखारी ठाकुर के (गबरघिचोर) आ राहुल सांकृत्यायन के (मेहरारून के दुर्दशा) के शामिल कइल गइल बा. खंड तीन में भोजपुरी के व्यवहारिक पक्ष प ध्यान दीहल गइल बा. जवना के तहत इकाई 9 में जहवां पाती के अलग-अलग रूपन में लिखे के बतावल गइल बा ओहिजा दोसर ओर इकाई 10 में संक्षेपण, भाव पल्लवन आ निबंध लेखन प जोर दीहल गइल बा. इकाई 11 में अनुवाद त इकाई 12 में संवाद शैली कइसे निखरी ई बतावल गइल बा. अंतिम खंड में अलग-अलग विषय प चरचा कइल गइल बा. इकाई 13 में संप्रेषण शैली त इकाई 14 में भोजपुरी लोक कला आ इकाई 15 में भोजपुरी मीडिया के सामान्य परिचय दीहल गइल बा. सबसे अंत में व्यवहारिक आ परिभाषिक शब्दावलियन के बारे में बतावल गइल बा.&lt;br /&gt;स्नातक स्तर प दाखिला लेवे वाला छात्र भोजपुरी के मिल(मॉडर्न इंडियन लैगवेजज)में से एगो विषय के रूप में ले सकेलन. ई पाठ्यक्रम पिछला साल से शुरू भइल बा. &lt;br /&gt;एह पाठ्यक्रम के संयोजक प्रो. शत्रुध्न कुमार बाड़े. प्रो. कुमार के भोजपुरी से बहुत लगाव आ प्यार रहल बा. आ इहे कारण बा कि उनकर सघर्ष रंग लाइल आ भोजपुरी पाठ्यक्रम के इग्नू जइस विश्वविद्यालय में एगो भासा के रूप में पढ़ावे के अनुमति मिलल. भोजपुरी के ई समाम्न दियावे में प्रो. कुमार के बहुते कठिनाइयन के सामना करे के पड़ल. बाकिर प्रो. कुमार के शब्दन में इग्नू के उपकुलपति प्रो.वी.एन.राजशेखरन पिल्लई जी के कारण भोजपुरी के ई सम्मान मिलल. उहां के जब भोजपुरी साहित्य के बारे में जननी त &lt;br /&gt;खुशी-खुशी भोजपुरी के पाठ्यक्रम में शामिल करे खातिर तइयार हो गइनी. हमनियों के गैर भोजपुरी भासी प्रो.पिल्लई जी के बहुत-बहुत साधुवाद कहे के चाहीं. एह पाठ्यक्रम के परिकल्पना के बारे में बतियावत प्रो. कुमार कहले कि ‘‘जे तरह से भोजपुरी के मांग पूरा दुनिया में बढ़ रहल बा, ओकरा के  देखत हमनी के एह भासा के पाठ्यक्रम तइयार कइनी जा. एह पाठ्यक्रम के तइयार करे में हमनी एह भासा से जुड़ल बुद्घिजीवियन से राय-मसौरा कइनी जा. तब जा के एह बेरा हमनी के एह भोजपुरी भासा के पाठ्यक्रम के धरातल प उतार पाइल बानी जा.’’ &lt;br /&gt;बाकिर सबसे अहम सवाल ई बा कि का हमनी के खाली भोजपुरी बोलहीं तक अपना के सिमटा के राख दीहब जा? आखिर कब हमनी के ई कहब जा कि हमनी के पढ़े आ लिखे दूनों आवेला? भोजपुरी खाली हमनी के भासा ना ह ई हमनी के संस्कारो हवे? त हमनी के कब ले आपन संस्कार से दूर भागब जा? एह तरह के कई सवाल बा जवना के जवाब हमनी के देवे के बा. त देर कवना बात के बा. चली चलल जाव भोजपुरी सीखे.&lt;br /&gt;राउर&lt;br /&gt;आशुतोष कुमार सिंह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(संपर्क-bhojpuriamashal@gmail.com)&lt;br /&gt;भोजपुरिया मशाल के नाम से ई कॉलम  बिहारी खबर साप्ताहिक पत्र में छप रहल बा. &lt;br /&gt;ओकर लिंक बा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.biharikhabar.com/current.php?page=02&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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मशाल'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-5513634871177282478</id><published>2010-05-24T02:43:00.000-07:00</published><updated>2010-05-24T02:44:45.344-07:00</updated><title type='text'>आगरा में मनल विश्व भोजपुरी सम्मेलन</title><content type='html'>पांडेय कपिल के सेतु सम्मान विश्व भोजपुरी सम्मेलन क बड़ उपलब्धि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भोजपुरी धीरे-धीरे आपन पांव सगरो दुनिया में पसार रहल बिया. जवना के एगो झलक लउकल आगरा में खतम भइल विश्व भोजपुरी सम्मेलन में. बाकिर स्थानीय भोजपुरिया लोगन के उदासी से देश-विदेश से आइल भोजपुरियन के मन तनी थोर हो गइल. ओहिजा के आंखो देखा हाल बता रहल बानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;डा. सुभाष राय&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रज के छाँह में भोजपुरी क दू दिन क विश्व सम्मेलन इहां प्यार की नगरी आगरा में संपन्न भइल. तनी विचार-विमर्श, तनी कविता पाठ अउर तनी नाच-गाना, बड़ा नीक मिक्स रहल. बाकिर आप समझीं की गीत-गवनई अउर नाच-गाना में जइसन भीड़ जुटल, वइसन ओ मौका प ना जुटल, जब साहित्य चर्चा होत रहल भा भोजपुरी के हित क बात. भोजपुरियन क एगो दिक्कति बा कि ऊ खूब मेहनत करेलन, खूब स्वाभिमान से रहेलन बाकिर जब बाति टिकुली, साड़ी, साज-सिंगार अउर नाच-नचउअल क होखे लागि त ओहि में खुद के भुला जालन. हम ई कइसे कहीं कि इहवों अइसने भइल बाकिर अगरा में 30-35 हजार से जियादा भोजपुरिया रहेलें, ओमे से का दसो हजार ई सुनि के घर से ना निकलि सकत रहलन कि उनकी नगरी में उनहीं के भाई-बंधु अतिथि बन के आइल बाड़े, उहो मारीशस, सिंगापुर, सूरीनाम अउर मलेशिया तक से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलीं छोड़ीं ई बात. पूरबी यूपी अउर बिहार से हमार कई ठो साहित्यकार मित्र भी सम्मेलन में आइल रहलन. इतवार के जब ऊ लोग अपना देस की ओर रवाना होत रहलन त मुलाकात भइल. हम पूछलीं कि रउवा सभै के एहि सम्मेलन के सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि का लागति बा? भोजपुरी क जानल-मानल साहित्यकार आ पाती पत्रिका के संपादक अशोक द्विवेदी अउर भोजपुरी गीत क बड़ हस्ताक्षर डा. कमलेश राय बिना झिझकले बोललन कि पांडेय कपिल जी के सेतु सम्मान एह सम्मेलन क सबसे बरियार उपलब्धि बा. एह सम्मान से ऊ लोगन के साहस अउर बढ़ी, जे भोजपुरी के मान-प्रतिष्ठा बढ़ावे खातिर जूझत बा, जे भोजपुरियन के उनकर अधिकार दियावे खातिर लड़त बा. कपिलजी आपन पूरी जिनगी भोजपुरी माई के सेवा में होम क दिहलन. ऊ खाली एगो रचनाकारे ना रहलन, उनके हिरदय में अपनी मातृभाषा के लेके अइसन हुलास रहल कि देस-विदेस में बहुत लोगन के भोजपुरी आंदोलन में जोड़ले में उनके कामयाबी मिलल. ई सेतु सम्मान उनकी जिनगी भर के संघर्ष क सम्मान बा. एहसे सबके खुशी बा बाकिर कुछ भोजपुरियन के ई बात के कष्ट देखाइल कि जेकर सम्मान भइल, ओकरे बारे में कुछ बतावे खातिन मंच प केहू जानकार अदिमी ना रहल. ई समझदारी क बात त ना भइल. चलीं हमहीं बता देईं, कम से कम ई रपटिया पढ़े वाला लोग त जानि लिहें कि पांडेय कपिल क का उपलब्धि बा. ऊ भोजपुरी क एक ठो बड़ रचनाकार आ अपनी भासा अउर संस्कृति के लड़ाई क प्रतीक-पुरुष हवें. उनकर फुलसुंघी उपन्यास क काफी चर्चा भइल. काफी समय तक ऊ उरेह पत्रिका क संपादक रहलन. भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका क भी ऊ संपादन कइल. उनकर नाम एक ठो गजल संग्रह भी बा – अचको कहा गइल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संगठन क बारे में सम्मेलन में का खास बाति भइल, ई केहू कुछ बुझल ना. काहे से कि ई कुल बन कमरा में भइल. हं, भाषण-भीषण सब सुनल. केहू ए सम्मेलन के सूर अउर कबीर क मिलन बतवलस त केहू हरिदास आ कबीर के. एक जना कहलन कि ई गंगा-जमुना क मिलन बा. ई कुल बाति क कवनो अरथ लगावल जाय त ई बुझाता कि भोजपुरी के दूसरकन बोलियन के विकास आ समृद्धि में आपन हित देखाता. ई नीक सोच बा. अगर राजनीति क नजरिया अलगाइ के सोचीं त बात सोलहो आना खरी बा कि हिंदी आ ओकरी बोलियन क भलाई साथे-साथे चलले में बा ना कि एक-दूसरा क टांग खींचला में. 1976 के भोजपुरी सम्मेलन में हिंदी के शलाका-पुरुष हजारी प्रसाद द्विवेदी कहले रहलन कि भोजपुरी क सोगहग प्रेम अगर निम्मन चित्त से आपन काम करे त हिंदी क राष्ट्रभाषा के रूप में मान-सम्मान बनल रही अउर एकरी कुल बोलियन क भी रस्ता केहू रोकि ना पाई. ई सोगहग क उत्पत्ति हजारी प्रसाद जी के अनुसार संस्कृत के सयुगभाग से भइल बा जवने क मतलब बा दूनो भाग यानी संपूर्ण. उनक मतलब ई रहल कि हिंदी आ भोजपुरी, दूनो साथे-साथे आगे बढें. अब ई सोगहग में ब्रज, अवधी, बुंदेली, मैथिलि सबके रखे के चाही. भाषणन से त लागल कि भोजपुरिया लोग द्विवेदीजी क रस्ता धरे के तइयार बा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रउरा के थोड़ा अचरज होई जब हम कहब कि भोजपुरी खातिन सबसे नीक बात सुझवलन एक ठो अवधीभासी विद्वान. ऊहो साइंस क अदिमी, जेके साहित्य आ भासा से दूर-दूर तक किछु लेवे-देवे के ना बा. अगरा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बाड़न प्रोफेसर के एन त्रिपाठी जी. उनकर विचार रहल कि सबसे जरूरी बाति बा भोजपुरी के साहित्य संग्रह आ ओमे जियादा से जियादा लेखन क, जवनी से ओकर समृद्धि बढ़े. भोजपुरी के जवन समरथ लोग बाड़े, ऊ अपना बोली क अपने घर आ दफतर में उपयोग करें. उनके एमे कवनो संकोच ना होखे के चाही. तुलसीदास कहले बान कि समरथ के नहिं दोस गुसाई. अइसन लोग जब भोजपुरी बोलिहें त लोग उनकर नकल करिहें. हिंदी आ देस की दूसरकी भासन से अच्छा साहित्य क अनुवाद भोजपुरी में कइल जाय, भोजपुरी क साहित्यिक पत्रिका निकालल जाय. एसे हमरी लइकन के अपनिये बोली में ऊ कुल पढ़े के मिलि जाई, जवनी खातिन ऊ अंगरेजी की ओर भागत बाड़न. ई बड़ बाति बा बाकिर का हमनी के ई कुल करे कै तइयार बानी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीक भइल कि एह सम्मेलन में राजनीतिक बाति ना भइल. किछु लोग भोजपुरी के संविधान की आठवीं अनुसूची में डारे खातिन सरकार पर दबाव डाले क बाति कइलन बाकिर ओके कवनो समर्थन हासिल ना भइल. भोजपुरी क आंदोलन अपने परंपरा क, संस्कृति क, अपने रीति-रिवाज आ अपने संस्कार क आंदोलन बा. एकर बागडोर अइसन हाथे में रहे के चाही, जवन संस्कृति आ भासा-साहित्य क मतलब जानत होखे. अगर अइसन ना होई त कुछ लोग जनता के एकजुटता क फायदा उठा के उनुहीं के ठेंगा देखा दिहें आ आंदोलन के हवा निकारि दिहें. जवने आंदोलन से महापंडित राहुल सांकृत्यायन जुड़ल रहलन, जवने से विख्यात साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जुड़ल रहलन, वोके संभारे के ओइसने व्यक्तित्व होखे के चाही.&lt;br /&gt;मारीशस से आइल रहलीं डा॰सरिता बुधू. उनका मन में भोजपुरी के लेके बड़ जोश देखात रहे. ऊ भोजपुरी खातिन बहुत कामो कइले बानी. उनकर बाति सुनिके सबकी आंखि में नमी आ गइल. ऊ यादि कइलीं वो दिन क जब यूपी आ बिहार के गिरमिटिया मजूर लेके कलकत्ता से पहिलका जहाज रवाना भइल रहल. कलकतवा से चलल बा जहजिया, बयरिया धीरे बहो. ऊ जहाज खाली गिनती के भोजपुरिया मजूर लेके ना जात रहे, ओमे गीता, रामायन भी जात रहे, पूरी भोजपुरिया भासा आ संस्कृति जहजिया प सवार होके जाति रहे. तबे त ऊ मजूर ऊहां विदेस की माटी प जाके मजूर से हुजूर बनि गइलें, गिरमिटिया से गोरमेंट हो गइलें. ई भोजपुरियन के मेहनत, लगन, ईमानदारी अउर स्वाभिमान क परिणाम ह. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एह सम्मेलन में आइल विदेसी भोजपुरियन से हमहन के बहुत कुछ सीखे के बा. उनकर भोजपुरी अब ऊ भोजपुरी ना रहि गइल, जवन ले के ऊ मारीशस, सूरीनाम, ट्रीनीडीड गइल रहलन. ऊ लोग ऊहां के स्थानीय लोगन से एतना घुलि-मिलि गइलन कि उनकी भासा क तमाम शब्द भोजपुरी में आ गइल. एहि तरे भोजपुरी के तमाम शब्द स्थानीय लोगन की भासा में समा गइल. हिंदुस्तानी भोजपुरी क दरवाजा भी हमनी के खुलल रखे के चाही जवने से कि हमहन के संस्कार ताजा बतास के झोंका से वंचित ना रहि जाय. अगर हम सभे वोतने क सकीं, जेतना एहि विश्व भोजपुरी सम्मेलन के मंच से सुझावल गइल बा त भोजपुरी क बहुत भला होई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ए-158, एम आई जी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड&lt;br /&gt;फोन 09927500541&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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इस गरमी से झुलसने वालों के बारे में वे भला क्यों सोंचे? इन्हें तो 22 डिग्री के तापमान में रहकर 45 डिग्री के तापमान पर अपनी अंगुली चलानी और उठानी है. जब सब, कुछ न कुछ बक ही रहे हैं तो मैंने भी सोचा कि क्यों न मैं भी इस बहती गंगा में हाथ धो लूं !!  सो मैं भी बैठ गया कंप्यूटर के सामने (लेकिन 22 डिग्री के तापमान में नहीं) अपनी अंगुली से आग बरसाने के लिए !! आग लगाने के लिए !! सब तो आग ही लगा रहे हैं न, तो भला मैं क्यों न लगाऊं?&lt;br /&gt;आग लगे अथवा बुझे, पहले इस पर ज्ञान बघार लिया जाए कि ये माओवादी कौन हैं? किस खेत में इनकी फसल इतनी उन्नत हो रही है? इनको उगाने में खाद-बीज देशी लग रहे हैं अथवा आयातित है. कही दोनों को मिलाकर संकर तो नहीं है. इन सभी पहलुओं पर तो ज्ञानियों को अपना ज्ञान बांटना ही चाहिए. लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही हैं, आपलोग समझ पा रहे हैं क्या? जब सभी जगह सूखा ही सूखा नजर आ रहा है, तो ऐसे में यह ‘लाल फसल’ इतनी हरी-भरी क्यों और कैसे है? इस फसल पर क्या ‘सूखे’ का असर नहीं होता? अथवा इनको सूखने ही नहीं दिया जाता!! संसद से लेकर विधानसभाओं में तक इस फसल पर खूब चर्चा होती है, और चर्चा इस कदर चर्चित होती है कि वह मुरझा गए इस फसल को हरीहरी दिखा देती है. हरीहरी देखकर भला किसका जी नहीं ललचायेगा! वैसे भी हम मानवीय जानवर जन्म से ही लालची होते हैं! सो लालच के घेरे में आते ही सफेदटोपी वालों को सीट की लालच और ‘लाल फसल’ को खाद-बीज की लालच की जद में आना पड़ता हैं. जब दो लालचियों, जिनका मकसद लगभग एक सा हो, सत्ता की प्राप्ति, चाहे जैसे यह प्राप्त हो. अंतर कर पाने में जरा मुश्किल पैदा होती है. सफेदवर्दीधारियों को लाइसेंस मिला हुआ है कि वे जिसको चाहे लाल-हरा करते रहें, लेकिन लाल फसल वालों को लाइसेंस नहीं मिला है. वे अगर लाल-लाल करने लगे हैं तो वह कानून के खिलाफ है. कानून के खिलाफ तो हरा-लाल करने वाले भी हैं! लेकिन शायद कानून बनाने की वजह से इनको कानून तोड़ने के लिये कुछ रियायत मिल जाती हो. और इन्हीं रियायतों के बल पर वे ऐसी परिस्थिति पैदा करते हैं कि लाल फसल को खाद-बीज मिल जाता है. और यह फसल बहुत तेजी से 20 रूपया रोज कमाने वालों के रोपनी और सोहनी के सहारे और घना और बरियार होते जा रहा है. एक अहम सवाल और मेरे मन में कौंध रहा हैं कि इस फसल के खरीदार कौन लोग हैं! इसका भाव कौन तय करता है? इस फसल का निर्यात तो शायद ही होता हो, वैसे भी हमलोगों को देशी उत्पाद को विदेशी मोहर के साथ गले लगाने में कोई हर्ज महसूस नहीं होता है. हर्ज़ हो भी क्यों? विदेशी चीजों को हम अपना स्टेटस सिंबल जो मानने लगे हैं. अपना संस्कार, अपना विचार, अपना ज्ञान अपनी संस्कृति, अपनी शिक्षा, सब का सब हमारे लिये किसी कूड़े के ढे़र के बराबर हो चुका है.&lt;br /&gt;खैर, इन बातों पर मैं अपना समय क्यों बरबाद करूं? इसका तो हमें कोई मेहनताना मिलना नहीं है. और जिस काम का मेहनताना न मिले भला वह काम कैसा? कुछ बुद्धिजीवी तो अपने एक-एक शब्द को भौतिक बाजार में नीलाम कर रहे हैं. निलामी में लगने वाली बोली के आधार पर उनकी बुद्धिजीवी सोंच से नरम –गरम, आग-पानी, दक्षिणपंथी-वामपंथी शब्द निकलते हैं. जो पंथ जैसी बोली लगाता है, उसी के हिसाब से शब्द गढ़े जाते हैं. शब्द गढ़ने में इन बुद्धिजीवियों को भला कौन पछाड़ सकता है! इनको जो मिलता है वह भी मेहनताना ही कहलाता है. पर मैं अपने लिये ऐसे मेहनताना नहीं मांग रहा हूं. मैं तो बस यह चाहता हूं, जैसा कि सब चाहते हैं, मैं जो लिखूं उस पर जो अपने को बुद्धिजीवी नहीं समझते हैं अपनी प्रतिक्रिया दें. क्योंकि जबतक किसी क्रिया पर प्रतिक्रिया न मिले ऐसा लगता हैं कि क्रिया हुई ही न हो. तो फिर देर किस बात की है आप भी अपना कलम नहीं नहीं, अपना कंप्यूटर खोलिये, की पैड पर अंगुली घुमाइए और 40 डिग्री के तापमान को झेलते हुए, जैसा की मैं झेल रहा हूं, अपनी बुद्धिमता से परे और संवाद के नीयरा अपनी बात को कह डालिये... यह लोकतंत्र हैं... सबको है अधिकार... हमको भी और आपको भी...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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वामपंथी दलों एवं अन्य विपक्षी दलों का गठबंधन बनाकर महंगाई के सवाल पर हड़ताल का उपक्रम करते है और तय रणनीति के विरुद्ध कट मोशन का समर्थन की जगह बायकाट कर सदन से बहिर्गमन करते है, ऐसा ही कुछ श्रीमती प्रतिभा पाटिल जी के राष्ट्रपति चुनाव में भी होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश में सुश्री मायावती, श्री अजित सिंह, श्री कल्याण सिंह यहाँ तक कि १९७७ से ८० तक भाजपा भी, श्री मुलायम सिंह के साथ काम-काज करके धोखा खा चुकी है. श्री राजीव गांधी मुलायम सिंह पर बहुत विश्वास करने लगे थे और अक्सर श्री गुलाम नबी आज़ाद के घर पर उनकी बैठकें होती थी. श्री वी.पी. सिंह की जगह श्री चंद्रशेखर के लाने की योजना का प्रारूप इन्ही बैठकों में तय हुआ था. रात भर राजीव जी से मिल कर सीधे सबेरे सोते हुए राज्यपाल को जगा कर राजीव जी से हुई बातचीत के प्रतिकूल सरकार भंग करने का काम करके कांग्रेस को पहली दगा देने का कामकाज भी नेता जी ने ही किया था. ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको दिया दागा नहीं. १४ सालों के अथक परिश्रम और अंधभक्ति के बदले मेरे खराब गुर्दे पर मोहन सिंह की टिप्पणी, मुझे बेशरम, कूड़ा, पागल कह कर बेइज्जत करने की भाई रामगोपाल की रणनीति, बच्चे की तरह पढाई से विवाह तक साथ निभाने पर भी अखिलेश यादव की मुझे निष्काषित करते वक्त की चुप्पी से यह आंकलन लगाया जा सकता है कि यदि सपाई और उनके मुखिया मेरे नहीं हुए तो किसके होंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोचीन में कुछ कामरेडों ने कहा कि न्यूक्लीअर डील बकौल मुलायम मैने कराई. मोहन सिंह ने आरोप भी लगाया कि ऐसा मैने व्यक्तिगत स्वार्थवश किया था और कांग्रेस से मेरा कुछ लेन-देन हुआ था. यहाँ तक कि सपा द्वारा इस वर्त्तमान सरकार के समर्थन में दिया पत्र मेरे हस्ताक्षर का है, मुलायम के हस्ताक्षर का नहीं, अतएव सपा द्वारा यू.पी.ऐ. सरकार को दिया गया यह समर्थन बिल्कुल अवैध है, ऐसा मोहन सिंह ने कहा. नेता जी महंगाई के सवाल पर अब आप विरोधी महागठबंधन में वामपंथियों के साथ है तो nuclear liability bill पर आप सरकार का साथ कैसे दे रहे है, अब तो अमर सिंह की संगत के दुष्प्रभाव से आप बिल्कुल मुक्त है. श्री प्रकाश कारत कृपया अब आप श्री मुलायम सिंह से पूंछे कि अब अपराधी कौन है, अमर सिंह तो अब नहीं है. इसी बात का आंकलन अन्य दलों के नेता और मोहन सिंह भी करें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने कहा था कि मै मुलायम सिंह का मात्र दर्जी और कूड़ेदान हूँ. उनकी गलत सलत नीतियों को नैतिकता का कपड़ा सिल कर संवारने का मै १४ साल का अपराधी और जनता एवं राजनीति के छले हुए पुरोद्धाओं का क्षमाप्रार्थी हूँ. दल के अन्दर की गलतियों का श्रेय लेने वाला कूड़ेदान अब मै नहीं रहा. आदरणीय मुलायम सिंह जी अब आप अपनी अच्छी बुरी राजनीति के अकेले जिम्मेदार दर्जी और कूड़ेदान खुद है, आपको अपनी नई भूमिका मुबारक, मेरे राजनैतिक निर्वाण के लिए बहुत बहुत शुक्रिया. कामरेड सुरजीत, अमर सिंह के बाद ४ सांसदों वाले लालू यादव ने आपको अपना कंधा रोने के लिए दे दिया है लेकिन भारी कीमत वसूल कर. २० से अधिक सांसद वाले मुलायम ४ सांसदों वाले लालू के पीछे घूम रहे है. मेरी चिंता छोडिये, जीवन की तमाम विधाएं जो राजनीति से भी ऊध्र्व है, मुझे उपलब्ध है. रेडिओ में बड़े भाई अमिताभ बच्चन का एक गाना आ रहा है. आपके सन्दर्भ में बिल्कुल खरा है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी तो जैसे तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे कट जाएगी,&lt;br /&gt;आपका क्या होगा जनाबे आली, आपका क्या होगा जनाबे आली &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोटः अमर सिंह के और लेख पढ़ने के लिए उनके व्लॉग पर जाएं.&lt;br /&gt;http://blog.thakuramarsingh.com/general/अब-अपराधी-कौन.php&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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गोरखा तनी चुस्की लेत कहलस. ई सुनके करिअठी कहलस ना हो, हमरा के मारे वाला के जनम लेले बा. गोरखा कहलस ना हमरा बुझाइल ह, कहीं तोहार बाबूजी तोहरा प पहड़ा लगा देले होखस. एह बात प करिअठी खिलखिला के हंस देलस. ओकर हंसी के आवाज सुनके गोरखा के अंग-अंग फरके लागल. बहुत दिन के बाद करीअठी एतना खुल के हंसले रहे. पिछला साल भर से त ऊ एकदमें गुमशुम हो गइल रहल हिय. पढ़ लिख के नौकरी के तलाश में ऊ शहरे-शहरे भटकलस बाकिर कहीं ओकरा मन लायक नौकरी ना मिलल. कहीं मिलतो रहे तो ओहिजा पुरूष मानसिकता हावी हो जात रहे. खुद के भुला के पुरूषन के गुलामी करे के शर्त रखल जात रहे. एह सब से तंग आके ऊ घरे जाए के फैसला कइले रहे.&lt;br /&gt;काहो बात करे के मन नइखे का...&lt;br /&gt;करिअठी टनक आवाज में कहलस. ओकर आवाज से अचानक गोरखा फेर से जाग गइल. ना. ना.. हम त तोहरे से बात करत बानी. गोरखा के जवाब देलस.&lt;br /&gt;पिछला पांच मिनट से हमहीं खाली बकत जात रहनी ह, तू कवनो जवाब काहे ना देत रल ह. खैर छोड़, आपन सुनाव का हाल चाल बा? तोहार पीएचडी के थिसिस तइयार भइल की ना? अउर सब दोस्तन के का हाल चाल बा? आ हं, कवनो लइकी पसंद कइल की ना! जल्दी आपन बियाह कर, हमरा ओकरा में खुब नांचे के बा.&lt;br /&gt;माघ के एह महीना में गोरखा के मुंह लाल हो गइल, शरीर से पसीना छुटे लागल. जी बेचैन होखे लागल. करिअठी के ई सब बात सुन के. कइसे कहो कि ऊ त आपन दिल के राजकुमारी के पसंद कइए लेले बा बाकिर...&lt;br /&gt;ऊ हड़बड़ी में करिअठी से कहलस की फोन रखु, हम तोहरा के बाद में फोन करत बानी.&lt;br /&gt;करिअठी खिसिया गइल. कहलस की का बात बा. जब हम तोहार बियाह के बात करेनी त तोहार मूड काहे खराब हो जाला. हमरा के कुछ नइखे बतावे के त मत बताव. गोरखा कहलस ना रे... अइसन कवनो बात नइखे. हमरा मन में अइसन कवनो बात नइखे जवन तू नइखु जानत. ओइसहूं हम तोहरा से कवनो बात के कब पर्दा कइले बानी (बाकिर एह झूठ के कहे में ओकर ओठ कांपत रहे).&lt;br /&gt;त बताव ना कि तू कब आपन बियाह करत बाड़. करिअठी हठ करत पुछलस.&lt;br /&gt;जब तोड़ होई!! ऊ जवाब देलस&lt;br /&gt;का मतलब!!&lt;br /&gt;मतलब ई की पहिले ते आपन बियाह करू.&lt;br /&gt;तब हम बियाह करब.&lt;br /&gt;हमरा बियाह-सियाह नइखे करे के... एह झंझट में हम नइखी पड़े के चाहत. हम आपन माई के सेवा करे के चाहत बानी. हम माई के सेवा में आपन जिनगी गुजार देब.&lt;br /&gt;करिअठी के एह बचकाना जवाब सुनके करिअठा खिसिया के मने-मने रह गइल.&lt;br /&gt;ऊ मने-मने सोचे लागल, बीए-एमए का क लेलस एकर त विचारे बदल गइल. बियाह-शादी एकरा झंझट लागत बा. आधुनिक बने के चक्कर में एह घरी के लइकी सांचो पागल हो गइल बारी स. बियाह से हो रहल मोह भंग सांचो बहुते सोचे वाला बात बा. बियाह ना करे वाला प्रवृति अब धीरे-धीरे गांवों में पसरे लागल बा. अब एह से भोजपुरिया क्षेत्रो अछूता नइखे रह गइल. लइकियन में एह तरह के रोग लागल त सांचो संस्कृति के तबाह करे वाला सिद्ध हो सकेला. ऊ करिअठी के समझावे के प्रयास कइलस. &lt;br /&gt;बाकिर ऊ माने के नाम ना लेत रहे...ओकर सोच एकदमे बदल गइल रहे.&lt;br /&gt;गोरखा सोच में पड़ गइल.&lt;br /&gt;ऊ आपन मोबाइल पटक देलस. आ सोचे लागल कि जेकरा खातिर ऊ जियत बा उहे ओकर जिनगी दोसरा के सौपे के चाहत बा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपर्क&lt;br /&gt;zashusingh@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 213px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S-AZKZYqwNI/AAAAAAAAAIM/Rq6yE5xi9BA/s320/DSC_6036.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5467397614031519954" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार में ‘‘गठबंधन अभिशासन एवं तीव्रगति विकास’’ का दौर चल रहा है. श्री कुमार ने कहा कि एक पार्टी का दौर भारत में खत्म हो गया हैं और अब मिलीजुली सरकारें ही चल पायेंगी. आजादी के समय भी मिलीजुली सरकार बनी थी. आजादी के बाद भारत के प्रधानमंत्री, पं0 जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बनी सरकार में भी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की अहमियत थी. लेकिन बाद में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे समाप्त होती गई. एक पार्टी की सरकार रहने पर तानाशाही होने की संभावाना बनी रहती है. श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी एन0डी0ए0 की सरकार बहुत अच्छे तरीके से अपने कार्यकाल को पूरा किया. अभी जो यू0पी0ए0 की सरकार केन्द्र में है, वह भी मिलीजुली सरकार ही है. हमारी सरकार भी राज्य में एन0डी0ए0 की मिलीजुली सरकार है. परन्तु केन्द्र की यू0पी0ए0 सरकार हमारी सरकार को अपेक्षित सहयोग नहीं कर रही है. पिछले वर्षों में बिहार के कोसी नदी में आये भीषण बाढ़ की समस्या में केन्द्र सरकार ने हमारी अपेक्षित मदद नही की. बावजूद इसके हमारी सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने पर है और पूरा देश राज्य के विकास गति को सहर्ष स्वीकार कर रहा है. राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय किसी भी तरह की समस्या उत्पन्न होने पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा जाता था, उन्हे विश्वास में लिया जाता था. कहने का मतलब यह हैं कि प्रांतीय नेताओं के बीच में आपसी ताल-मेल होती थी. क्रमशः कांग्रेस पार्टी का अन्दरूनी ढांचा धीरे-धीरे राज्यों के नेतृत्व को नजर अन्दाज करने लगा. फिर राजनीति बदलने लगा. एक बार लोहिया जी सरकार के किसी प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुए. पहली बार सरकार के विरूद्ध आवाज उठाए. उन्होंने कहा कि राज्य में जब मुख्यमंत्री कपड़े की तरह बदले जाएंगे, महीनों के अन्दर सरकार बदली जाएगी तो विकास कैसे सम्भव है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S-AZ6ySV-CI/AAAAAAAAAIU/NO9En5rNnBc/s1600/DSC_6012.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 213px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S-AZ6ySV-CI/AAAAAAAAAIU/NO9En5rNnBc/s320/DSC_6012.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5467398445349599266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  मुख्यमंत्री श्री कुमार दैनिक जागरण समाचार पत्र समूह के ‘‘जागरण फोरम’’ द्वारा नई दिल्ली स्थित ‘‘होटल संग्रीला’’ में आयोजित ‘‘गठबन्धन अभिशासन एवं तीव्र विकास गति’’ पर आयोजित परिचर्चा में बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि वर्तमान सामाजिक परिवेश में गठबन्ध ही देश एवं राज्य को चला सकता है. उन्होंने कहा कि विकास की गति प्राकृतिक परिस्थिति पर निर्भर करता है. श्री कुमार ने बताया कि जब अंग्रेज का राज था तो गन्ना उद्योग लगाने के लिए उत्तर बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश को चुना. परंतु आज पश्चिमी क्षेत्र में गन्ने की खेती के लिए 35 से 40 बार सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है जबकि बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो से तिन सिंचाई में ही उत्पाद प्राप्त हो जाता है. उन्होंने कहा कि जब प्राकृतिक सुविधा को नजर अन्दाज कर केन्द्र एवं राज्यों में चल रहे कांग्रेस पार्टी की सरकार कार्रवाई करने लगी तो विकास अवरूद्ध होना स्वाभाविक था. इसी नीति के कारण देश की पूर्वी हिस्से में हरित क्रान्ति ने अपना दम तोड़ दिया. उन्होंने कहा कि बिहार के श्रमिक पंजाब और हरियाणा में जाकर खेती करते है परन्तु बिहार पिछड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि मेरा विश्वास है कि गठबन्धन कहीं ज्यादा अच्छा शासन दे सकता है. श्री कुमार ने कहा कि वर्त्तमान में चल रहे गठबन्धन सरकार में ऐसा देखा गया है कि चुनाव पूर्व गठबन्धन अधिक कारगर है क्योंकि ऐसे गठबन्धन नीतिगत् होती है. चुनाव प्रश्चात् अधिकाधिक गठबन्धन स्वार्थ से प्रेरित होता है.  इस परिचर्चा समारोह का उद्घाटन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने किया . इस मौके पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा,,, पंजाब के उपमु्ख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल सहित कई गणमान्य लोगों ने अपने विचार रखे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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सरकार ही चलेगी : नीतीश कुमार&lt;/strong&gt;'/><author><name>bhojpuriyababukahin</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00677976949564721957</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S9vEV0YEliI/AAAAAAAAAHk/2C8g6pPE8Vk/S220/ASHUTOSH+blog+photo.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S-AZKZYqwNI/AAAAAAAAAIM/Rq6yE5xi9BA/s72-c/DSC_6036.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1692358131297480952.post-2982960085897153982</id><published>2010-05-01T01:58:00.000-07:00</published><updated>2010-05-01T02:00:17.169-07:00</updated><title type='text'>आपके साथ संवाद प्रेरणादायक हैः  नीतीश कुमार</title><content type='html'>&lt;em&gt;नीतीश कुमार जब से ब्लॉग की दुनिया में आए हैं धमाल मचाए हुए हैं. उनको लगातार प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं. लोगों के इस स्नेह से अभिभूत नीतीश कुमार अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस अदांज में दिए है... &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पहले पोस्ट के एक सप्ताह में सैकड़ों रेस्पोंस मिले हैं सच कहूँ तो इनमे से कई मेरे लिए बेहद उपयोगी और प्रेरक हैं चाहे अररिया जिला के मो राशिद रजा हों या हैदराबाद के विश्वजीत या फिर अमेरिका से सीमा ..... इन सबने उन प्रमुख बिन्दुओं का बखूबी जिक्र किया है जिनकी बदौलत बिहार में बदलाव का माहौल सुगठित होता जा रहा है।&lt;br /&gt;यह मेरे लिए बहुत उत्साहजनक है कि आपलोगों ने मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना कि अपरिहार्यता को गंभीरता से लिया है। मैंने अपने पहले पोस्ट में इस योजना क़ी साथर्कता और प्रासंगिकता का जिक्र किया था। आपके संवाद से साफ़ है कि इस योजना में राज्य में सुदूर से शहरी इलाकों में रहने वाली बच्चियों और उनके परिवारों की महत्त्वकाँक्षा को सुदृढ़ किया है। इन बाबत आपके संवाद मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायक हैं। आपकी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद बहुमूल्य रेस्पोंस भेजने के लिए मैं आपका आभारी हूँ । हर एक का जबाब दे पाना शायद मुमकिन न हो । सप्ताह भर में सैकड़ों रेस्पोंस के जरिये व्यक्त किये गए आपके विचार न केवल सराहनीय हैं बल्कि मेरे लिए बेहद अहम् हैं । इन्हें पढने के बाद मैं तठस्थ और अडिग महसूस कर रहा हूँ । इनमें बिहार को नई ऊँचाई तक ले जाने वाली लाखो प्रेरणाएं साफ़ निहित दिख रही हैं जो भविष्य में यह सुनिश्चित करेगी की राज्य में अवसरों की उपलब्धता लोगों की क्षमताओं और उम्मीदों को परिपुर्णित करे।&lt;br /&gt;सरकार के प्रयासों के जरिये बिहार में बदलाव दिख रहा है .... व् इस परिवर्तन के प्रति सकारात्मकता व्याप्त है। बिहार और बिहारियों के प्रति इन सकारात्मक्ताओ की कहानीयाँ आपने गाँव , शहर एवम यहाँ तक की अमेरिका के प्रान्तों से भी सुनाई हैं । सरकार और प्रशासन के प्रयास अकादमिक , मिडिया एवम प्रबुद्ध लोगों के योगदान के अलावा जिस एक ख़ास चीज़ का महत्त्व इस माहौल को व्याप्त बनाने के प्रति रहा है , वो मेरी समझ से हम आम नागरिकों के बीच दिन-प्रतिदिन होने वाले बहुतेरे संवाद हैं । मैं इनकी महता को शायद कुछ-कुछ समझता हूँ...... यही वजह हो कि आज ब्लॉग के जरिये मैं आपसे मुखातिब हूँ ।&lt;br /&gt;लोग बिहार में आये दिन बन रही नई सड़कों , अस्पतालों , इत्यादी के साथ साथ प्रशासनिक व्यवस्था में झलक रही नई सोच व् कर्मठता , एवम आवाम में झलकते विश्वास व् सौहार्द्य को बदलते बिहार का प्रारूप मानते हैं। हालाकि, साथ ही बिजली कि कमी और निजी क्षेत्र कि हिस्सेदारी को बढ़ावा देने जैसी कई चुनौतियों का जिक्र करना भी लाज़मी है। आपको ज्ञात होगा कि हमने कई विधुत परियोजनाओं के लिए पहल की है, व् इनकी स्थापना की प्रक्रिया विभिन्न चरणों पर है। विधुत उत्पादन इकाईयों से सम्बंधित प्रस्ताव तैयार करना और फिर इसके आधार पर परियोजना की स्थापना करने में काफी वक्त लगता है। जाहिर है की यह एक जटिल काम है। खासकर केंद्र से पहल कर coal linkage जैसी चीजों को सुनिश्चित कराना कई बार चुनौतीपूर्ण होता है। आपको ज्ञात होगा की वर्ष 2004-2005 में हमें विरासत में विधुत की शून्य उत्पादकता मिली थी... लेकिन हमने इसे चुनौती के बतौर स्वीकार किया और इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं । हम सामाजिक एवम व्यवसायिक विकास में निजी और सार्वजनिक साझेदारी की संभावनाओं पर भी लगातार काम कर रहे हैं । हमने बिहार पुल निर्माण निगम जैसे सार्वजनिक उपक्रम को पुनर्जीवित कर आज एक अग्रणी की सूचि में ला खड़ा किया है। अन्तराष्ट्रीय लेवल की कई agencies के साथ हमारी साझेदारी फलीभूत होती दिखने लगी हैं।&lt;br /&gt;मैं हर्षित हूँ की उच्च शिक्षा को आपने भी एक बेहद महत्वपूर्ण विषय के रूप में देखा है। इस बावत , खासकर बिहार के होनहार विद्यार्थियों के सुझाव एवम विचार इंगित करते हैं कि वर्तमान परिपेक्ष में बिहार के लिए इस विषय पर काम करना बेहद प्रासंगिक है । बिहार सरकार ने इन चंद वर्षों में उच्च शिक्षा के विकल्पों को बढ़ाने के लिए BIT Meshra की बिहार शाखा , चाणक्य law university , चन्द्रगुप्त मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट और आर्यभट knowledge university जैसी इकाईयों की स्थापना कराई है । राज्य सरकार IIT patna और नालंदा अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर सारे जरुरी प्रावधानों को सुनिश्चित कर चुकी है। आने वाले समय में आप ऐसी कई योजनाओं को फलीभूत होते देखेंगे ।&lt;br /&gt;अंत में , ब्लॉग पर लिखने के मेरे इस नए प्रयास का आपने जिस गर्मजोशी से स्वागत किया है उससे मैं पूर्णतया आश्वस्त हूँ कि मेरी भविष्य कि सोच, नीतियों और कार्यप्रारुपों को निश्चित दिशा देने में सक्षमता आएगी। एक ब्लॉगर के रूप में मेरा स्वागत करने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद । मैं इन्टरनेट की पीढ़ी के वन्धुत्व को सादर स्वीकार करता हूँ।&lt;br /&gt;आने वाले समय में मैं अपने अनेक विचार आपसे साझा करता रहूंगा । आपके रेस्पोंस जानने के बाद मैं समझता हूँ कि आप भी बिहार में क़ानून व्यवस्था और जिम्मेदार प्रशासन को हमारी सरकार की ख़ास उपलब्धियों की सूचीं में देखते हैं। मेरे पहले ही पोस्ट पर आपके इतने सारे विचार मुझे इन्हें प्राथमिकता में रखने को प्रेरित कर रहे हैं । मेरी कोशिश है की अगले पोस्ट में मैं इन पर चर्चा करूँ । &lt;br /&gt;आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा । &lt;br /&gt;हार्दिक साधुवाद सहित ,&lt;br /&gt;नीतीश &lt;br /&gt;नोट यह पोस्ट बिना किसी संपादन के प्रस्तुत किया जा रहा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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क) बिहार साहित्य अकादमी की स्थापना, ख) सार्वजनिक पुस्तकालयों का पुनरुद्धार और ग) राजकीय कोश से आर्थिक रूप से दुर्बल साहित्यकारों को फेलोशिप प्रदान किया जाना. इस सम्बंध में आपके विचारों को जानने की उत्सुकता बनी रहेगी.’ न्यू जर्सी यूएसए से आशीष मिश्रा नीतीश जी को सलाह देते हुए लिखते हैं कि, आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन सड़क के मसले पर और ध्यान देते तो अच्छा होता. न्यूयार्क से दिग्विजय लिखते हैं कि हम चाहते हैं कि आप भविष्य में भी ऐसे अच्छे काम करते रहे. सउदी अरब से अखलाक अहमद बिहार के लोगों को संबोधित करते हुए लिखते हैं कि अगर आपलोग बिहार को विकसित देखना चाहते हैं तो नीतीश कुमार को एक बार फिर सत्ता में लाइए. अपने कमेंट के माध्यम से समीर गौरव यह कहना चाह रहे हैं कि आज से पांच साल पहले बिहारी शब्द गाली का पर्याय हुआ करता था पर अब माहौल बदल गया हैं. बिहार के ललित नारायण मिश्रा यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट प्रोग्राम के निदेशक एस.एम झा विश्वविद्यालय में सिनीयरीटी और जूनीयरीटी को लेकर चल रहे वैधानिक घालमेल की ओर सरकार का ध्यान अपनी ओर आकृष्ठ कराते हुए सरकार से यह सवाल पुछ रहे हैं कि, किसी जूनियर और कम जानकार के अंडर में किसी सीनियर और ज्यादा जानकार को काम करना पड़े तो क्या दुख देने वाली बात नहीं है? इसी तरह पटना जिला के दनियामा प्रखंड के कौशल किशोर अपने प्रखंड में मिड डे मील को लेकर हो रही गड़बड़ियों की शिकायत की है. वे लिखते हैं कि ‘मेरे प्रखंड के कई मिडिल स्कूलों में मिड डे मील स्कीम नहीं चल रहा है. हेड मास्टर और गाँव के कतिपय दबंग बच्चों का हक़ मार रहे हैं. प्रखंड पदाधिकारी और शिक्षा पदाधिकारी को बार बार कहने पर भी कोई सुनवाई नहीं हो रही है. राज्य की राजधानी पटना के एक प्रखंड दनिआमा के बहुतायत स्कूलों में मिड डे मील की अगर यह हालत है तो बाकी जगहों में इस के हाल का अंदाज किया जा सकता है. सर इस पोस्ट के माध्यम से मेरी यह गुजारिश है के इस की जांच करवाई जाय और मिड डे मील स्कीम को दनियामा प्रखंड में निर्बाध रूप से चालु करवाया जाय.’&lt;br /&gt;इसी तरह सैकड़ो लोग नीतीश कुमार को उनके इस ब्लॉग के माध्यम से अपनी शिकायत, अपना सुझाव और अपना गुस्सा उन तक पहुंचा रहे हैं.&lt;br /&gt;इंजीनियर नीतीश के व्लॉगर बनने से उनके प्रशंसकों में खुशी हैं, लेकिन एक बात जो सबको खटक रही हैं वह यह हैं कि नीतीश के इस व्लॉग पर अभी तक व्लॉग जगत की नामी-गिरामी हस्तियां लगभग नदारद हैं.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेखक द संडे इंडियन न्यूज मैगजिन से जुड़े हुए हैं&lt;br /&gt;संपर्कः-zashusingh@gmail.com&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;मीडिया खबर डॉट कॉम से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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सभी पार्टियों ने मिलकर राजनीतिक अपराध को बढ़ावा दिया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0- आपने उन उम्मीदवारों को टिकट नहीं देने की वकालत कर रहे हैं, जिनपर महज मुकदमें चल रहे हैं. आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं. ऐसे में उनके अधिकारों का हनन नहीं होता? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- आपने ठीक कहा. लेकिन आपको क्या लगता है, शहाबुद्दीन, लालू यादव, शिबू शोरेन, पप्पु यादव- सरीखे तमाम लोगों पर क्या कोई झुठा केश दर्ज कर सकता है! &lt;br /&gt; यदि कोई करता भी है तो आप सीधे इसका कम्पलेन हाईकोर्ट में कीजिए कि आप पर फर्जी मुकदमा किया गया है. नैतिकता भी कोई चीज होती है. आप अपने को पहले सारे मामलों में बरी करा लो फिर चुनाव लड़ो. एक आइडियल बनों. लोग तुमसे प्रेरणा लेंगे. &lt;br /&gt;प्र0-  आपकी तीसरी मांग. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- जो राजनीतिज्ञ अपनी सम्पत्ति का ब्योरा नहीं देते उनकी सम्पत्ति को जब्त किया जाए. यह बात हमारी ही नहीं है. इस बावत लॉ कमिशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन वी.पी. जीवन रेड्डी ने भारत सरकार को 1999 ई0 में ही कहा था कि जन प्रतिनिधियों की सम्पत्ति को सार्वजनिक किया जाए एवं ऐसी मशिनरी तैयार की जाएं जिससे जन प्रतिनिधियों की आय का सही ब्योरा चेक आउट किया जा सके. यह दुखद बात है कि 1999 में इससे सम्बंधित एक बिल लाया गया लेकिन अभी तक वह पेश तक नहीं हो पाया है. &lt;br /&gt; सरकारी अधिकारियों के लिए एक पब्लिक सर्विस कंडक्टर रूल बनाया गया है, जिसके तहत इनको अपने ऐसट्स डिकीलियर करने होते हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिज्ञों के लिए यह जरूरी नहीं है. &lt;br /&gt; सरकार के पास इस तरह का कोई मशिनरी नहीं है जो यह चेक करे की राजनीतिज्ञ जो अपने असेट्स के बारे में बता रहा है वह सही है या गलत.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0- अभी जो स्थिति बन रही है इसका कारण कहीं राष्ट्र राज्य की यूरोपीय अवधारणा को यथावत अपनाया जाना तो नहीं है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- यह कहना गलत है. हमारे संविधान को एक सभा ने मिलकर बनाया. जिसमें सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, जवाहर लाल नेहरू, भीम राव अम्बेडकर जैसे पंडित वकील थे. पूरे विश्व के संविधानों का अध्ययन करने के बाद यह संविधान बना. &lt;br /&gt; हमारा संविधान अच्छा है. कितनी भी अच्छी चीज क्यों न हो जब वह बेइमानों के हाथ में पड़ती है तो वह चीज मिट्टी हो जाती है. इस बारे में राजेन्द्र प्रसाद कहा करते थे कि विधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, इसकी उपयोगिता तभी है जब यह सुयोग्य लोगों के हाथ में हो.पाकिस्तान में तो विधान बन भी नहीं पाया. जिन लोगों को इस संविधान से कहीं भी आपत्ति है, वे बताएं की वैकल्पिक क्या व्यवस्था हो सकती है. हमारे पास संविधान में संशोधन करने की गुंजाइस तो हैं ही. लेकिन एक जो सबसे महत्वपूर्ण विषय है, वह है कि जब तक यहां का नागरिक संविधान में वर्णित कर्तव्यों का पालन नहीं करता है, तब तक उसके अधिकारों के कोई मायने नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0- यदि कर्तव्यों की ही बात करें अथवा नैतिकता की ही बात की जाएं तो, ‘हिन्द स्वराज’ में गांधी ने जो सपना देखा था, जो बातें कहीं थी, वे बातें आज के मौजूदा हालात में कितना अर्थयुक्त हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- गांधी के विचारों के मूल में दो मुख्य बातें है- पहला सत्य और दूसरा अहिंसा. बाकी जितनी भी बातें हैं-मसलन चरखा, शराब बंदी, वयस्क मताधिकार की बात, सभी इन मूल बातों के प्रयोग में साधन के समान है. गांधी ने जो कुछ भी कहा उसके पीछे एक दूर दृष्टि थी. &lt;br /&gt;उन्होंने वयस्क मताधिकार की ही बात की और कहा कि देश के प्रत्येक वयस्क (महिला/पुरुष) को मत देने का अधिकार होना चाहिए. इस बात पर विरोध भी हुआ परन्तु गांधी का मानना था कि जनता के नुमाइंदे जब गांव-गांव वोट मांगने जायेंगे तब ग्रामीण जनता में राजनैतिक समझ बढ़ेगी, उनकी भागीदारी सुनिश्चित होगी. जनता अगर नाराज़ हो जाए तो कैसी भी सरकार हो उसको उखाड़ कर फेक देगी. आज के राजनीतिज्ञ वोट के लिए जनता को शराबी एवं बेइमान बना रहे हैं. ऐसा गांधी ने कभी नहीं सोचा होगा. आज गांधी रहते तो यह सब देखकर उनका ‘हार्ट अटैक’ हो जाता. &lt;br /&gt;एक बार मैं काका कालेलकर से मिला और उनसे गांधी को एक पैरा में डिफाइन करने को कहा-उन्होंने मुझसे कहा एक पैरा में क्यों? कहो तो मैं गांधी को चार शब्दों में समेट दूं. उन्होंने फिर बताया कि - सत्य, अहिंसा, संयम एवं सेवा, इन चार तत्वों से मिलकर गांधी का निर्माण होता है. तब से मेरे लिए ये चार शब्द जीवनमंत्र बन गए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0 - आप इन चारों शब्दों को अपने नब्बे वर्षीय जीवन में कहां तक उतार पाएं हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- मैं तो इन्हीं शब्दों को कसौटी मानकर चलता हूं. कई बार गिरता हूं, सम्भलता हूं और पुनः एक सत्याग्रही की तरह चल पड़ता हूं. मैंने 1942 में गांधी जी के कहने पर सरकारी नौकरी को छोड़ दिया था. उसी समय मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. परन्तु हम सत्याग्रहियों का आंदोलन खत्म नहीं हुआ जो निरंतर आज भी लोक सेवक संघ के रूप में चल रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0- आज के संदर्भ में यदि हम देखे तो हमारी भाषा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था एवं राष्ट्रीय सम्प्रभुता पर वैष्विक पूंजि का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है. जिसको समीक्षक नवउपनिवेशवाद की संज्ञा तक देने लगे हैं. इस स्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- आज दुनियां सिमटकर एक मोबाइल में बंद हो गई है. आज वैष्विक गांव की बात हो रही है. जो भी भाषा, संस्कृति होगी या है वह मानव समुदाय के हितार्थ ही बनती बिगड़ती है. जहां तक इसके प्रभाव का प्रश्न है तो ऐसा नहीं है कि हमारे ही देश पर पड़ रहा है. हमारी सभ्यता, संस्कृति का प्रभाव भी अन्य देशों पर पड़ा है. जब हम दूसरे देशों में जाकर व्यापार कर सकते हैं, पूंजि लगा सकते हैं, वहां की कम्पनियों का अधिग्रहण कर सकते हैं तो फिर दूसरों को आप अपने देश में आने से कैसे रोक सकते हैं? कम्प्यूटर आया था तब भी हाय-तौबा मची थी, लेकिन इसने कितनों को बेरोजगार किया. लगभग नहीं के बराबर. कितनों को रोजगार दिया, यह छुपी हुई बात नहीं है. आईटी का बूम सभी जानते हैं. हम लोग अकारण डरे हुए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0-इसी संदर्भ में एक और प्रश्न, आज के भारत में गांधी, भगत सिंह, नेहरू, अंबेडकर, लोहिया, सुभाष एवं जे.पी. के विचारों पर पूंजिवाद हावी है. विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश एवं विश्व व्यापार संगठन अपने हिसाब से भारत को चला रहे हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हूं. इन बैंकों से मदद हम लेते. हम इनके पास जाते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0- एक और अहम सवाल उठता है कि आज जिस तरह से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल पूरे देश में है. ऐसे में वह कौन सी राजनीतिक पार्टी है जो इस अस्थिरता के माहौल से भारत को निकाल सकती है?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उत्तर- यह बात तो ब्रह्मा भी आएं तो नहीं बता सकते हैं. लेकिन तुलनात्मक रूप से क्रांग्रेस को मैं अच्छा समझता हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0- आप उस कांग्रेस की बात कर रहे हैं जिसकी महत्ता को खुद गांधी ने 28 जनवरी 1948 को नकार दिया था? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- यह बात सही है कि गांधी जी अपने मरने के दो दिन पहले यह कहे थे कि ‘कांग्रेस’ की जरूरत इस देश को नहीं है. कांग्रेस को भंग कर दिया जाएं. परन्तु ऐसा नहीं हो सका. गांधी को मार दिया गया. खैर यह अलग विषय है. आज के परिपेक्ष्य में मुझे कांग्रेस लिस्ट कम्युनल लगती है. जबकी भाजपा कम्यूनल दिखती है. ऐसा नहीं है कि भाजपा में अच्छे नेता नहीं है. भ्रष्टाचार के मामले में सभी पार्टियां बराबर है. आज जनता की नजर में राजनीति चलाने वालों का ग्राफ बहुत गिर गया है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0- एक नये, सुंदर, नैतिक-अनुशासित एवं सही अर्थों में स्वतंत्र भारत को लेकर आपके क्या सपने रहे थे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- हमारे ख्वाबों की ताबीर इतनी भयानक होगी उम्मीद न थी. मैं तो मानता हूं कि जब नागरिक चुप बैठ जाएगा. जुल्म बरदास्त करेगा तो देश डूब जायेगा. एक बार पुनः सत्याग्रह करने की जरूरत है ताकि ‘हिन्द स्वराज’ की परिकल्पना पूर्ण हो सके. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्र0- एक अंतिम प्रश्न, आज का नौजवान भटके हुए हैं. भारत का भविष्य इन्हीं पर टिका हुआ है. भारत के भावी कर्णधारों को आप क्या कहना चाहेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर- मैं भी इनसे वही बात कहुंगा जो हमारे बुजूर्गो ने मुझसे कहा था. गर भारत ही नहीं रहेगा तब कौन जीवित रहेगा. यदि भारत बचा रहा तब रहने वाले तो आप ही होंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोटः&lt;br /&gt;शम्भू दत्ता&lt;br /&gt;• गांधीयन सत्याग्रह ब्रीगेड के महासचिव है. &lt;br /&gt;• लोक सेवक संघ के कार्यकारी चेयरमैन है.&lt;br /&gt;• इन्होंने अपने नाम से ‘शर्मा’ शब्द को जाति सूचक होने के कारण हटा दिया है. &lt;br /&gt;• इनका साक्षात्कार 10/10/08 को लाजपत भवन, नई दिल्ली में में लिया गया था.&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8v9vLr_cCI/AAAAAAAAAG0/wtJN4jcZJpc/s320/Padmashri_Sharda_Sinha_on_the_evening_of_26th_March_2010_at_Hansdhwani_Theater,on_occasion_of_bihar_utsav_in_Pragati_Maidan...jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461737960149839906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;22 मार्च 2010 से 5 अप्रैल 2010 तक चलने वाला बिहार उत्सव, बिहार में बदल रहे माहौल का गवाह बना. बिहार को लेकर जो भ्रम बाहर की दुनिया ने पाल लिया था वह टुटता हुआ नजर आया. बिहार को अछूत समझने वाले अब बिहार को गले लगा रहे थे. बिहार की जयकारा लगा रहे थे. बिहार में बह रही विकासात्मक बयार की महक को लिए हुए पुरवा बयार दिल्ली के प्रगति मैदान में इस तरह बह रही थी मानो उसका प्रत्येक झोका यह कह रही हो कि दुनिया को ज्ञान देने वाला बिहार, अब अपने अतीत के धरोहरों को सहेजने लगा हैं, पुरानी गलतियों से सीख लेकर दुनिया के विकासात्मक कदम के साथ कदमताल करने के लिए वह खुद को पूरी तरह से तैयार कर लिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार को लेकर ऐसा आयोजन दिल्ली में पहली बार हुआ था. जिसके कारण दिल्ली में रह रहे बिहार के लोगों में इस आयोजन को लेकर बहुत ही उत्साह था. खासतौर से वैसे बच्चे, जो मूलतः बिहार के हैं लेकिन आज तक उनको बिहार जाने और बिहार की सभ्यता और संस्कृति को समझने का मौका नहीं मिला था, के लिए यह उत्सव बहुत ही उपयोगी साबित हुआ. इससे उनको अपने मूल को समझने का मौका मिला. एक ही जगह पर बिहार के अतीत और वर्तमान दोनों से रू-ब-रू होने का मौका मिला. संजय झा पिछले 20 सालों से दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहते हैं. उनकी शादी को 16 साल हो गए. 14 साल का एक लड़का है मंतोष, जो स्थानीय सर्वोदय विद्यायालय में पढ़ता हैं,  लेकिन अपने जन्म से लेकर अब तक वह बिहार का दीदार नहीं कर सका था. इसलिए संजय झा ने उसको बिहार उत्सव देखाने का फैसला किया था, ताकि वह अपने मूल की चीजों के बारे में कुछ तो जान सके. मंतोष बिहार उत्सव में आकर बहुत खुश था. तरह-तरह का सवाल पुछ रहा था. बिहार को लेकर उसके दोस्तों ने जो नकारात्मक तस्वीर उसके मन में भर दिया था, वह धीरे-धीरे दूर हो रहा था. इतना सब कुछ अपने बिहार में है? वह अपने पापा से पूछा था और झल्ला कर बोल रहा था कि पापा मेरे दोस्त झूठ बोलते हैं कि हमारा बिहार अच्छा नहीं है. वह बहुत खुश था. लिटी-चोखा खाकर तो वह इतना खुश हुआ कि पापा से कहने लगा कि 10 लिट्टी खरीद दीजिए घर ले जाउंगा. इस तरह हजारों ऐसे बच्चे इस उत्सव में आये होंगे जिनको बिहार की कला संस्कृति और संस्कार को समझने का मौका मिला होगा. &lt;br /&gt; बिहार उत्सव के लिए जो हॉल बना था, उसको बियाडा एंवं उधोग विभाग बिहार सरकार के दिशा निर्देश के अनुसार सजाया एवं संवारा गया था. जिसको सजाने-संवारने में बिहार के गौरवमयी अतीत व स्वर्णिम वर्तमान को विशेष रूप से केन्द्र बिन्दु में रखा गया था. बिहार उत्सव में प्रवेश करते ही बायें भाग में एक पेटिंग की गैलरी बनाई गई थी जिसके दीवारों पर पूरातत्वकाल, लौहयुग, मौर्यकाल, गुप्तकाल के अलावा पटना कलम एवं मधुबनी पेटिंग के एक से बढ़कर एक पेटिंग को दर्शाया गया था. यहां पर प्रदर्शित पेटिंगों में बिहार की विभूतियों, विरासत, लोकसंस्कृति एवं परंपरा को प्राथमिकता दी गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8wAyM5XEYI/AAAAAAAAAHc/yzOIjAdaarE/s1600/DSC_0115_1.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8wAyM5XEYI/AAAAAAAAAHc/yzOIjAdaarE/s320/DSC_0115_1.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461741310548840834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जब उत्सव और उत्साह की बात की जा रही हो तो बिना गीत संगीत के छौक दिए, बात अधूरी रह जाती है. लिहाजा बिहार उत्सव के आयोजकों ने 15 दिनों तक प्रगति मैदान की शाम को रंगीन बनाने के लिये कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा था. बिहार के लोक कला के रंग में प्रगति मैदान एक पखवाड़े तक रंगीन होता रहा और उसकी धून पर वहां पहुंचे दिल्ली में रह रह रहे बिहारवासी एवं कला प्रेमी थिरकते रहे. सबसे गाढ़ा रंग तो 26 मार्च 2010 की सांय को देखने को मिला जब प्रगति मैदान के हंस ध्वनि थियेटर में बिहार के कला एवं संस्कृति विभाग के सौजन्य से उधोग विभाग, बिहार सरकार द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. और इस कार्यक्रम में भोजपुरी एवं मैथिली की लोकप्रिय गायिका बिहार कोकिला पद्मश्री शारदा सिन्हा ने अपनी गायिकी से हजारों की संख्या में उपस्थित श्रोता एवं बिहार से आये अधिकारियों को भावविभोर कर दिया. वहीं दूसरी ओर बिरजू महाराज की शिष्या सुप्रसिद्व नृत्यागंना नीलम चौधरी ने ‘गंगा नृत्य नाटिका’ प्रस्तुत कर अपनी नृत्य कला से उपस्थित दर्शकों का मन जीत लिया. शारदा सिन्हा ने ठुमरी, कजरी, विवाह गीत, चुमाउंन, सोहर, प्रेम गीत, छठ गीत एवं अन्य भोजपुरी भक्ति गीतों से हंस ध्वनि थियेटर में बैठे हजारों दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया. इस मौका पर शारदा सिन्हा ने कहा कि, ‘गर्व है कि मैं बिहारी हूं.’ इसी कड़ी को यादगार बनाते हुए नटराज कला केन्द्र पटना की सुप्रसिद्व गायिका डा0 पुश्पा प्रसाद एवं निमिशा शंकर ने भी अपनी गायिकी से उत्सव के उत्साह को और बढ़ा दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8v9wRo_MaI/AAAAAAAAAHE/iX_EVF4vnmk/s1600/DSC_0612.JPG_puspa+prasad+%26+nimisha+shankar.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8v9wRo_MaI/AAAAAAAAAHE/iX_EVF4vnmk/s320/DSC_0612.JPG_puspa+prasad+%26+nimisha+shankar.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461737978927722914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  गीत-संगीत के साथ-साथ कलाप्रेमियों अगर कलाकृतियों की प्रदर्शनी देखने का मौका मिल जाए तो ‘सोने पर सुगंध’ जैसा अनुभव होता है. ऐसा ही हुआ भी. मूर्तिकला में शांति स्तूप, अगमकुआं, गौतमबुद्ध का भिक्षापात्र,  डाल्फिन का संरक्षण, राजगीर, नालन्दा तथा अन्य धरोहरों को बेहतरीन रुप से प्रदर्शित किया गया था. पोस्टर के जरिए बिहार के इतिहास में योगदान करने वाले विभूतियों समेत मधुबनी पेटिंग, शांति स्तूप, यक्षिणी, बोधिवृक्ष और लोक कला के विकास को केन्द्र में रखकर दर्शाने की कोशिश की गई थी. प्रदर्शनी में भगवान महावीर का चित्र एवं बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे तपस्यारत भगवान बुद्ध, भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष, मंजूशा के साथ का छायाचित्र तथा प्रथम बौद्ध संगीति द्वितीय बौद्ध संगीति की पेन्टिंग लोगों को आकर्षित करती रही. इसके अलावा इस उत्सव का मुख्य आकर्षण मशहूर भागलपुरी सिल्क, मिथिला पेंटिंग, सिकी से निर्मित सामग्री, भभुआ के पत्थर का आकर्षक हाथी, मेहंदी, मोतीहारी का आकर्षक सीप से निर्मित आभूषण, टेरा कोटा से निर्मित वस्तुएं, जूट निर्मित वस्तुएं यथा जूट ज्वेलरी, टिकुली आर्ट के साथ-साथ नालंदा, बिहारशरीफ का निपुरा सिल्क एवं हस्तकरघा से निर्मित बेड-सीट और चादर विशेष रूप से रहा. लेकिन जिन चीजों ने लोगों को अपने ओर ज्यादा खींचा वह था पटना के कलाकार अशोक विश्वास एवं शिवानी विश्वास की टिकुली क्राफ्ट. टिकुली क्राफ्ट की उत्पति लगभग आठ सौ साल पहले पटना सिटी से माना जाता है. उस समय रानी-महारानी, टिकुली यानी बिन्दी पर सोने की परत चढ़ाकर टिकुली लगाय करती थीं. इसी कला को जीवित रखते हुए अशोक एवं शिवानी विश्वास, उपेन्द्र महारथी संस्थान के सहयोग से टिकुली आर्ट को देश एवं विदेशों में फैलाने में दिन रात लगे हुए हैं. जिससे स्थानीय महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है. स्टॉल का संचालन कर रही शबीना एवं रंजीता सिंह ने टिकुली आर्ट के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि टिकुली क्राफ्ट में हार्ड बोर्ड पर इनेमल पेटिंग से चित्रकारी की जाती है, जिसमें मुख्यत: हम शादी के मंडप, ग्रामीण परिवेश, कामकाजी महिला, बिहार के उत्सव तथा लोकसंस्कृति व परंपरा को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं. बिहार उत्सव में जिन टिकुली क्राफ्ट की प्रदर्शनी लगायी गई थी उनमें टेबल मेट, टी कोस्टर, टेलीफोन स्टेड, टेऊ  आदि प्रमुख थे. उन्होंने बताया कि प्रसिद्ध अभिनेत्री बेजंती माला भी अपने बिन्दी में टिकुली आर्ट का प्रयोग किया करती थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8v9w5gVEUI/AAAAAAAAAHM/l0BkaNrnHNo/s1600/TUKULI_ART_OF_BIHAR.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8v9w5gVEUI/AAAAAAAAAHM/l0BkaNrnHNo/s320/TUKULI_ART_OF_BIHAR.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461737989628825922" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टिकुली आर्ट से अपने जुड़ने के बारे में अशोक विश्वास ने बताया कि टिकुली आर्ट को आगे बढ़ाने की प्ररेणा उन्हें उपेन्द्र महारथी संस्थान की ओर से जापान यात्रा के दौरान मिली, जहां पर उन्होंने निपोनेस मोटीफ से  इस आर्ट के बारे में विस्तृत जानकारी मिली. आज पटना के लगभग 150 से अधिक महिलाएं इस आर्ट की ट्रेनिंग लेकर अपनी जीविकापर्जन कर रही हैं. इतना ही नहीं काष्ठ शिल्प कलाकृतियों ने भी आगंतुकों को खुब लुभाया. काष्ठ शिल्प का झंडा देश-विदेश में गाडऩे वाले लाल बाबू शर्मा ने बताया कि काष्ठ शिल्प कला बनाने के लिए साल, सागवान, सखुआ आदि लकडिय़ों की जरूरत होती है. इसकी मांग भारत के अलावा विदेशी बाजार में भी काफी ज्यादा है. यहां पर प्रदर्शित कलाकृतियों की कीमत 750 रुपये से लेकर 15 हजार रुपये तक की थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8v9vijbbVI/AAAAAAAAAG8/JWD0p95Pno8/s1600/0002.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8v9vijbbVI/AAAAAAAAAG8/JWD0p95Pno8/s320/0002.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461737966287940946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार के बदले तस्वीर को अब दुनिया मानने लगी है और इस तस्वीर में अपनी तस्वीर को जोड़ने के लिए व्याकुल भी दिख रही है. शायद यहीं कारण है कि इस उत्सव में 125 से अधिक निवेशकों ने बिहार में निवेश करने की दिलचस्पी दिखाते हुए इससे संबंधित जानकारी हासिल की.&lt;br /&gt;बिहार स्थापना दिवस के आलोक में दिल्ली में मनाये गए 15 दिवसीय बिहार उत्सव की जानकारी देते हुए बिहार आधौगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण की प्रबंध निदेशक अंशुली आर्या ने कहा था कि, ‘बिहार के प्रति आदर और गौरव को बढ़ावा देने के लिए इस उत्सव का आयोजन किया गया हैं. 22 मार्च 1912 को ही बिहार और उड़ीसा राज्य के गठन की उदघोषणा का राजकीय गजट में अधिसूचित होने के आलोक में राज्य सरकार द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को राज्य का स्थापना दिवस ‘बिहार दिवस’ के रूप में राजकीय समारोह के साथ मनाया जायेगा. इसी क्रम में आज बिहार में पंचायत एवं राज्य मुख्यालय स्तर तक विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है तथा इसे और वृहद रुप देते हुए बिहार सरकार ने दिल्ली के प्रगति मैदान में 15 दिवसीय बिहार उत्सव एवं हस्तशिल्प कला व हथकरघा मेला सह प्रदर्शनी का आयोजन किया है. बिहार उत्सव में बिहार की सांस्कृतक विरासत, ऐतिहासिक महत्व, आधुनिक बिहार के निर्माण में योगदान एवं वर्तमान में बिहार के विकास हेतु कार्यान्वित योजनाओं से लोगों को अवगत कराया गया है. इसके अलावा यहां पर बिहार के विश्वविख्यात लेखकों की पुस्तकों की प्रदर्शनी भी लगाई गई है.’ उन्होंने आगे कहा था कि, ‘बिहार में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति में सुधार आने से औधोगिक गतिविधियां तेज हो गई है. राज्य को पिछले चार वर्षो में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं.’ &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8wAxuR991I/AAAAAAAAAHU/UtDC6buPg1o/s1600/Concluding+Ceremony+of+15+day+long+Bihar+Utsav+2010+At+Pragati+Maidan+New+Delhi..JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 229px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S8wAxuR991I/AAAAAAAAAHU/UtDC6buPg1o/s320/Concluding+Ceremony+of+15+day+long+Bihar+Utsav+2010+At+Pragati+Maidan+New+Delhi..JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461741302330554194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बिहार उत्सव के सफलतापूर्वक संपन्न होने की प्रसन्नता की झलक इस उत्सव के इवेंट मैनेजर ज्ञानेन्द्र सिंह के चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रही थी. ज्ञानेन्द्र सिंह इस बावत बताया कि,  काफी कम समय में हमने बिहार उत्सव के लिए इस हॉल को बियाडा एंवं उधोग विभाग बिहार सरकार के दिशा निर्देश के अनुसार सजाया एवं संवारा था. बिहार उत्सव में आने वाले दर्शकों ने हमारे इस प्रयास  को काफी सराहा. उन्होंने कहा कि बिहार उत्सव में आने वाले अगन्तुकों ने बढ़ चढक़र दिलचस्पी दिखाते हुए स्वागत कक्ष के पास लगे सुक्षाव व अनुभव पट्टिका पर अपने अनुभवों को भी बयां किया. &lt;br /&gt;बिहार उत्सव के अनुभव के बारे में दिल्ली में बिहार के रेजीडेंट कमीश्नर आलोक चतुर्वेदी ने कहा कि, ‘इस उत्सव का बहुत ही सकारात्मक और उत्साहवर्धक अनुभव रहा. बिहार की स्थापना के बाद पहली बार बिहार को लेकर इतना भव्य तरीका से दिल्ली में कोई आयोजन हुआ था. लोगों ने बढ़चढक़र हिस्सा लिया. खासतौर से वे लोग जिनकी नई पीढ़ी बिहार का दीदार नहीं कर पाई थी, उनके लिये भी यह बहुत अच्छा अवसर था कि वे अपने बच्चों को बिहार के बारे में जानकारी दे सकें. गर्मी के मौसम ने निश्चित रूप से आयोजन में जरा सी मुश्किले पैदा की, बावजूद इसके कार्यक्रम बहुत ही अच्छा रहा. हम चाहते थे दिल्ली हाट में यह आयोजन हो क्योंकि वह दिल्ली के बीच में पड़ता है, प्रगति मैदान जरा दूर पड़ रहा था. फिर भी यह आयोजन बहुत ही सफलता के साथ संपन्न हो गया. बिहार के इमेज को सवारने में भी इससे फायदा हुआ. सभी राज्यों के इस तरह के कार्यक्रम हुआ करते थे, बिहार का नहीं होता था,  इस बार बिहार ने भी इस तरह का आयोजन कर के अपनी साख को बढ़ाया है. विदेशी निवेशक भी इस उत्सव में बिहार सरकार के संपर्क में आए हैं, लेकिन इन सभी प्रक्रिया को क्रियान्वित होने में अभी समय लगेगा.’&lt;br /&gt;आगामी 6 महीने बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने जा रहा है. अभी से ही चुनावी रंग में स्थानीय नेता रंगने लगे हैं. लेकिन देखना यह है कि नीतीश सरकार, दिल्ली में दिखाये गए बदलते बिहार की तस्वीर के सहारे अपनी तस्वीर को कितना साफ कर पाती है, और इसका कितना फायदा आगामी चुनाव में उठा पाती है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 219px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_CanUmXuIpWI/S72oem3b_xI/AAAAAAAAAGs/6eOABuGFpcA/s320/hind-swarajj16.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5457703567225519890" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;के. एन. गोविन्दाचार्य इन दिनों राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन चला रहे हैं। सज्जन शक्तियों को एक मंच पर ले आना इनका मुख्य उद्देश्य है। गोविन्दाचार्य को गांधी के विचारों में भारत की समस्यायों का समाधान नज़र आ रहा है। वहीं गांधी की अमूल्य रचना ‘हिन्द स्वराज’ के भी सौ वर्ष पूरा हो चुका है। 2009 को पूरी दुनियां स्वराज वर्ष के रूप में मना चुकी है। इसी आलोक में भारत की समस्या, उसका समाधान और गांधी विषय पर गोविंदाचार्य से रू-बरू हुए आशुतोष कुमार सिंह &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. गांधी जी की दृश्टि में इतना नहीं था कि अंग्रेज भारत से चले जाए। भारत अपनी तासीर तेवर एवं जरूरत के हिसाब से समाज संचालन के लिए संरचनाएं भी गढ़ता चले और समाज, जीवन, सत्य, प्रेम और अहिंसा के अधिष्टान पर सुचारू ढंग से चले, ऐसा गांधी का मानना था। समाज का हर हिस्सा इज्जत की जिन्दगी जिए। आजादी का अर्थ है  कि कमजोर से कमजोर इंसान में भी अभिव्यक्त हो। गांधी की दृष्टि सत्ता हस्तांतरण या राजनैतिक आजादी के सीमित अर्थों तक में बंधी हुई नहीं थी। &lt;br /&gt;2. राष्ट्र राज्य की प्रचलित अवधारणा तो महज 300 साल पुराना है। भारत में राष्ट्र एवं राज्य न पर्यावाची है और न ही सम्व्याप्त । भारत की अंग्रेजी शासन से आजादी, राष्ट्र एवं राज्य की अवधारणा के कारण ही भारत के विभाजन में बदली जो न सही था न समाधान कारक था। अखंड भारत की भूसंस्कृति सच्चाई है और भारत के आत्मा के अनुकूल है। &lt;br /&gt;3. आज के भारत के लिए हिन्द स्वराज सौ साल के मुकाबले अधिक अर्थवान है। जब हम प्रत्यक्ष अनुभव ले रहे हैं कि पैसा कमाना ही सुख नहीं है या सुख पैसे में ही नीहित नहीं है। आज हमें हिन्द स्वराज ज्यादा अर्थवान लगता है। यह समर्थ भारत के साथ भारत को सार्थक बनाने के लिए सशक्त विचार है। &lt;br /&gt;4. वैश्विक पूंजि भाषा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था एवं राष्ट्रीय संप्रभुता की जड़े खोद रही है। कहने को तो पूंजि वैश्विक है परन्तु इसका संचालन नवउपनिवेषवादी ताकतों द्वारा हो रहा है। दूसरी नियति मुनाफा कमाना है न की जनकल्याण। &lt;br /&gt;5. आज का ‘भारत’ तो गांधी, भगत सिंह, सुभाष, नेहरू, अम्बेडकर, लोहिया एवं जयप्रकाश नारायण का है जबकि ‘इंडिया’ विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश एवं विश्व व्यापार संगठन के मातहत हो गया है। भारत का सर्वसामान्य व्यक्ति अपने मूल्य बोध पर टिका है। तथाकथित पढ़ा लिखा सम्भ्रांत व्यक्ति विदेशी पूंजि का चरण चुंबन कर रहा है। &lt;br /&gt;6. हां, दुनियां में अपनी ताकत एवं गरिमा के अनुरूप योगदान के बजाय पश्चिमी जीवन मूल्य, जीवन शैली का ध्यानकरण करना अनूदित रूप से बढ़ना ही तो हुआ। &lt;br /&gt;7. सत्ता के ढांचे का भारत के तासीर और तेवर से मेल न होना ही भारतीय संसद में निरंतर हो रही गिरावट के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है। आज सत्ता द्वारा गरीब आदमी को खारिज कर दिया गया है। राजनैतिक नेतृत्त्व की समाज के प्रति संवेदनशिलता एवं प्रतिबद्धता का अभाव भी क्षरण का महत्त्वपूर्ण कारण है। &lt;br /&gt;8. मैं किसी राजनीतिक दल या राजनेता में भारत का भविष्य नहीं देखता बल्कि यहां के सामान्य युवा सामाजिक पूंजि एवं सांस्कृत परंपरा में भारत का भविश्य देखता हूं। &lt;br /&gt;9. हां, अराजकता का भीषण खतरा हमारे सामने है। इस व्यवस्था के प्रति जन आक्रोश एवं सत्ता के उलट-पूलट से प्राप्य निराशा समाज को अराजक स्थिति की ओर ढकेल रहा है। &lt;br /&gt;10. मैं सोचता हूं कि अंधाधूंध वैष्विकरण एवं बाजारवाद देश की स्वत्व के अनुरूप अभिव्यक्ति में सबसे बड़ा बाधा है। वैश्विकरण, एकरूपीकरण, बाजारीकरण एवं केन्दीयकरण इसके लक्षण है। अतः नए, सुन्दर, नैतिक अनुशासित एवं सही अर्थों में स्वतंत्र भारत के लिए यह जरूरी है कि- विकेन्दीकरण, स्थानीयकरण, विविधिकरण के अधिष्ठान पर बाजारमुक्त राजनैतिक, आर्थिक व्यवस्था की ओर भारत अग्रसर हो तभी समृद्धि प्राप्त होगी, तभी समृद्धि का संस्कृति से मेल भी रहेगा। तब भारत समृद्ध एवं समर्थ होने के साथ-साथ सार्थक भी रहेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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शायद सभी जानते हैं. पर सच में कोई नहीं. गांधी को जानने के लिए, धरातल पर जीना होता है, पर जीने के लिए कहां कोई तैयार है! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महात्मा गांधी, प0 जवाहर लाल नेहरू को अंत समय तक अपना वारिस बताते रहे. उन्हें भारत की सत्ता सौंपा भी. पर शायद नेहरू ने भी गांधी को नहीं समझा. हो सकता है गांधी ने भी नेहरू को न समझा हो. आजादी पूर्व 5 अक्टूबर 1945 ई0 को गांधी ने नेहरू को एक पत्र लिखा. जिसमें वे लिखते हैं-&lt;br /&gt;चि0 जवाहरलाल,&lt;br /&gt;तुमको लिखने को तो कई दिनों से इरादा था, लेकिन आज ही उसका अमल कर पा रहा हूं. अंग्रेजी में लिखूं या हिन्दुस्तानी में यह भी मेरे सामने सवाल रहा था. आखिर में मैंने हिन्दुस्तानी में ही लिखना पसंद किया. पहली बात तो हमारे बीच में जो बड़ा मतभेद हुआ है उसकी है. अगर वह भेद सचमुच है तो लोगों को भी जानना चाहिए. क्योंकि उनको अंधेरे में रखने से हमारा स्वराज का काम रूकता है. मैंने कहा है कि ‘हिन्द स्वराज’ में जो मैंने लिखा है उस राज्य पद्धति पर मैं बिलकुल कायम हूं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि गांधी के विचारों को प0 नेहरू 1945 ई0 तक आत्मसात नहीं कर पाए थे. इसी पत्र में गांधी आगे लिखते हैं कि मैं यह मानता हूं कि हिन्दुस्तान को कल देहातों में ही रहना होगा, झोपड़ियों में रहना होगा, महलों में नहीं. मेरे कहने का निचोड़ यह है कि मनुष्य जीवन के लिए जितनी जरूरत की चीज है, उस पर निजी काबू रहना ही चाहिए-अगर न रहे तो व्यक्ति बच ही नहीं सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मैं चाहता हूं कि हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझ लें. उसके दो सबब हैं. हमारा संबंध सिर्फ राज कारण का नहीं है. उससे कई दर्जे गहरा हैं. उस गहराई का मेरे पास नाप नहीं है. वह संबंध टूट भी नहीं सकता. इसलिए मैं चाहूंगा कि हम दोनों में से एक भी अपने को निकम्मा नहीं समझे. हम दोनों हिन्दुस्तान की आजादी के लिए जिन्दा रहते हैं और उसी आजादी के लिए हमको मरना भी अच्छा लगेगा. अगर मैं 125 वर्ष तक सेवा करते -करते जिन्दा रहने की इच्छा करता हूं, तब भी मैं आखिर में बूढ़ा हूं और तुम मुकाबले में जवान हो. इसी कारण मैंने कहा है कि तुम मेरे वारिस हो. कम से कम उस वारिस को मैं समझ लूं और मैं क्या हूं वह भी वारिस समझ लें तो अच्छा ही है और मुझे चैन रहेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आनंद भवन, इलाहाबाद से 9 अक्टूबर 1945 को प0 नेहरू ने पत्र का जवाब देते हुए कहा कि ‘मुझे समझ नहीं आता कि किसी गांव में सच्चाई और अहिंसा पर इतना बल क्यों दिया जाता है? गांव वालों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना होगा कि वे शहरों की संस्कृति में खुद को ढाल सकें. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; इस पत्र में अगला दुखद अचरज वाला पक्ष तब उभर कर सामने आता है, जब नेहरू, गांधी के स्वराज के सपनों की धज्जियां उड़ाते हैं- वे लिखते हैं कि उस बात को कई साल हो गए हैं जब मैंने ‘हिन्द स्वराज’ पढ़ी थी. आज मेरे दिमाग में उसकी धूंधली सी यादें हैं. लेकिन जब मैंने उसे 20 या अधिक साल पहले पढ़ा था तब भी वह मुझे अव्यवहारिक लगी थी. मुझे तब अचरज हुआ जब आपने कहा कि वह पुरानी तस्वीर आज भी आपके दिमाग में बसी हुई है. आपको मालुम ही है कि कांग्रेस ने उस तस्वीर पर कभी विचार ही नहीं किया. उसे स्वीकार करने की बात तो छोड़ ही दीजिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नेहरू का सपाट सा जवाब भारत में ‘गांधी दर्शन’ की उपस्थिति और क्रियान्वयन नीति पर करारा तमाचा था. इस तमाचे को गांधी क्यों सहन कर गए, यह शोध का विषय हो सकता है. &lt;br /&gt; गांधी ने अपने अंतिम लिखित दस्तावेज में कहा कि कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए. और लोकसेवक संघ की स्थापना होनी चाहिए. पर आजतक न तो कांग्रेस भंग हुई और न ही लोकसेवक संघ का उनका सपना पूरा हुआ. गांधी मारे गए. उनका नाम कांग्रेस ढो रही है पर उनके विचार को अपनाना कांग्रेस के लिए टेढी खीर साबित हो रहा है. गांधी दर्शन को कब्र में दफनाकर कांग्रेस नेहरू की सोंच से बाहर निकलने के मुड में नहीं दिख रही है. नेहरू के विचार को आगे बढ़ाने के लिए अब राहुल गांधी को सामने लाया जा रहा है. यह एक और धोखा है, महात्मा गांधी के गांधी के साथ. गांधी के नाम पर राष्ट्र के साथ किए जा रहे वैचारिक घाल-मेल को देख कर गांधी की आत्मा भी सर पीट रही होगी.&lt;br /&gt; &lt;strong&gt;गांधी को अगर सही ढंग से अपनाया गया होता तो शायद आज दंतेवाड़ा में 73 जवानों को शहीद नहीं होना पड़ता. न नक्सली होते और ना नक्सलवाद. चारों ओर मानववाद का बोलबाला होता. कोई किसी का प्यासा नहीं होता!! &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Email-zashusingh@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;script src="http://www.bbc.co.uk/worldservice/widget/widget.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;
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